गिरते हुए पुल

गिरते हुए पुल

किसी मंत्री की बीवी के जो पैरों में पड़ी पायल, या उसके हाथ में हीरे जड़ी कोई अंगूठी है। इसी के ख़र्च से झुककर गिरा मेरे शहर में पुल; इसी कंक्रीट में दबकर मरी इक माँ की बेटी है। महीने भर की है तनख़्वाह हज़ारी, तीस या चालीस। उसी अफ़सर के घर में है जो…

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दुर्दशा

दुर्दशा

  (1) सदियों से बेख़्वाब रही स्त्रियों की ठिठकी, सिमटी, मसली-सी बदहाल ज़िन्दगियों में अनहद दुःख रहे हैं। सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स की दीवारों पर बिखरी टिप्पणियों और शेयरिंग्स से यह खुद-ब-खुद ज़ाहिर है कि जल-जलकर बुझ जाना ही औरतों का इतिहास रहा है। यह कहानी है दुःख, दर्द, पीड़ा, अन्याय, संघर्ष और विवशता के अथाह…

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सज़दा

सज़दा

लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के सामने वाली सड़क पर चहल-पहल तेज़ हो गयी है. सुबह के कुछ 9 बजे रहे हैं. और नवाबों के शहर की शहज़ादी साहिबा अभी तक आराम फरमा रहीं हैं. मोहतरमा जबसे हॉस्टल में आयीं हैं तबसे खुद को डॉक्टर समझने लगी हैं, सुबह 4 बजे शब्बा ख़ैर होती है…

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एक नया विहान

एक नया विहान

बड़ी खुशी की बात है कि साहित्य सभा, आई.आई.टी.(बी.एच.यू.) ने अपना यह ब्लाॅग शुरु किया है। हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषाओं में कहानी, कविता, निबंध, साहित्यिक आलोचना, फिल्म समीक्षा, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, इत्यादि के रूप में हमारी रोचिभूषित रचनाओं का हर वक़्त आपको इंतज़ार रहे, यही इस ब्लॉग का हासिल होगा। आपको हमारी सभा के अजस्र-शब्द-वृष्टि-निरत सारे…

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