प्यार की खोज

पूरा बचपन प्यार-मोहब्बत की पिक्चर देखने में निकल गया। जब बड़े होकर अपने दोस्तों को प्यार के समंदर में गोते लगाते देखा, तो दिल ने दिमाग़ को इश्क़ के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। एक दिन जब उस तिलिस्मी इश्क़ को जानने को मन बेसब्र हो गया, तो निकल पड़ी मैं प्यार की…

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क्या सोचा था औ’ क्या पाया

क्या सोचा था औ’ क्या पाया

गंगा की धूमिल धारा में, तपते से मरू सहारा में, जेठों में पड़ी दरारों में, बेमौसम के सैलाबों में, तुमको घुटते देख रहा हूँ, मैं भारत हूँ खेद रहा हूँ। ना राम मिले ना मिली ही माया, क्या सोचा था औ क्या पाया। मुन्ना के पंजर दिखते हैं, अम्मा के नैना रिसते हैं, जीवन सर्वत्र…

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इश्क़ तुम्हारा

इश्क़ तुम्हारा

इश्क़ तुम्हारा ग़ज़ल रुबाई, मधुर कहानी, मंद गीत है, लोरी भी है। इश्क़ तुम्हारा चहल-पहल है, कोयल-कलरव, हवा वसंती, बारिश भी है। इश्क़ तुम्हारा दर्शन भी है, डगमग नैया, एक खेवैया, धारा भी है। इश्क़ तुम्हारा राधा भी है, शब्द मौन है, रात अकेली, सिसकी भी है।

कविता (मानव छंद)

कविता (मानव छंद)

कविता समाज का दर्पण अंतर्मन का अर्पण है, साहित्य के अंशुमाली का यह आत्म समर्पण है। अलंकार रस छंद सभी निज भावों की भाषा है, गति-यति-लय मिलन बिंदु पर सुख-दुख की परिभाषा है। व्यथित हृदय प्यासे को ज्यों दरिया देत दिलासा है, लश्तम-पश्तम में हिय निज भरती यह जिज्ञासा है। मदमस्ती मदहोशी है बेहोशी खामोशी…

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सोच

सोच

न जाने ये सोच, इतना क्यों घबराती है? कभी भी सही वक़्त पर, बाहर ही नहीं आती है । अनजानों के सामने तो, सहम-सी जाती है। पर कभी-कभी तो, अपनों से भी लजाती है। बाद में उन पलों को, याद करके पछताती है। कुछ न कर पाने का, अफ़सोस जताती है। मानती हूँ कि तुझे…

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His words were unheard, his voice wasn’t…

His words were unheard, his voice wasn’t…

“Hey, people!”, I said and received gazes from a score of a pair of eyes. “Sir”, he said, and no one saw him in the eye. Similarities between him and I: We both had all our physical characteristics resembling a human being. We both had unkempt hair and not-so-clean clothes. We both were seeking attention. Differences between him…

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BB की लाइन्स

BB की लाइन्स

कुछ साल पहले एक फ़िल्म आयी थी—डेढ़ इश्किया। वैसे बॉक्स आफिस पर फ़िल्म तो कुछ खास नहीं कर पायी, पर इस फिल्म में कुछ सीन्स ऐसे थे जो रूह को छू गये। वो दिलकश दृश्य ज़हन में आज भी तरो-ताजा हैं। गुस्ताख़ी माफ़ हो, पर मैं कोई बोल्ड सीन का ज़िक्र नहीं कर रहा जो…

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The लफ्ज़ Flux

The लफ्ज़ Flux

बुखार था वीज्ञान का, इंजीनरिंग सिखने लगे, ले सॉफ्टी पी. सी. व एम कि, साहित्य छिकने लगे। मशीन अब भरम, अभिराम शब्द में मिलने लगे, न सी न जावा, कोड भि तुकबंद हम लिखने लगे। न फ़ारमूला, अब ज़ेहन में शायरी टिकने लगे, गणित कहाँ, हम मेहबूबजान को लिखने लगे। शिखर जभी हिलने लगे, कली…

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