सोच

सोच

न जाने ये सोच, इतना क्यों घबराती है? कभी भी सही वक़्त पर, बाहर ही नहीं आती है । अनजानों के सामने तो, सहम-सी जाती है। पर कभी-कभी तो, अपनों से भी लजाती है। बाद में उन पलों को, याद करके पछताती है। कुछ न कर पाने का, अफ़सोस जताती है। मानती हूँ कि तुझे…

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His words were unheard, his voice wasn’t…

His words were unheard, his voice wasn’t…

“Hey, people!”, I said and received gazes from a score of a pair of eyes. “Sir”, he said, and no one saw him in the eye. Similarities between him and I: We both had all our physical characteristics resembling a human being. We both had unkempt hair and not-so-clean clothes. We both were seeking attention. Differences between him…

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BB की लाइन्स

BB की लाइन्स

कुछ साल पहले एक फ़िल्म आयी थी—डेढ़ इश्किया। वैसे बॉक्स आफिस पर फ़िल्म तो कुछ खास नहीं कर पायी, पर इस फिल्म में कुछ सीन्स ऐसे थे जो रूह को छू गये। वो दिलकश दृश्य ज़हन में आज भी तरो-ताजा हैं। गुस्ताख़ी माफ़ हो, पर मैं कोई बोल्ड सीन का ज़िक्र नहीं कर रहा जो…

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The लफ्ज़ Flux

The लफ्ज़ Flux

बुखार था वीज्ञान का, इंजीनरिंग सिखने लगे, ले सॉफ्टी पी. सी. व एम कि, साहित्य छिकने लगे। मशीन अब भरम, अभिराम शब्द में मिलने लगे, न सी न जावा, कोड भि तुकबंद हम लिखने लगे। न फ़ारमूला, अब ज़ेहन में शायरी टिकने लगे, गणित कहाँ, हम मेहबूबजान को लिखने लगे। शिखर जभी हिलने लगे, कली…

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काठ की गुड़िया

काठ की गुड़िया

काठ की गुड़िया. बचपन का ज़रिया. निर्धन हूँ, बापू की बुचिया. ज़िद कर डाली, लाने को कंचे. बैठा भेड़इया दूर कहीं. ले आये पटरा-सटरा, आकार दिया, दिन रात दिया. कपड़े सिले, पहनाये. हाथ दिया मैं ना मानी; बापू समझाते यही बढ़िया, काठ की गुड़िया. काहे रोती? मत रो बुचिया! बहके मन को जोत दिया. माई ने गोद भरा, कहती—यह सब मोह भरा! मेरी गुड़िया! बापू मेरे भी यही किया; तू भी रख ले, काठ की गुड़िया. कई वर्ष हुए. मैं नर्स हुई. उगते जीवन का हर्ष हुई. नन्ही हथेलियाँ स्पर्श हुईं. मैं स्वावलंबी उत्कर्ष हुई. बापू तुमने साकार किया. सपना मेरा,  विश्वास किया. अर्थ दिए, सामर्थ्य दिए. अब रोज़ बनाती; प्राण की गुड़िया, संसार की गुड़िया, धनवान की गुड़िया, अनजान की गुड़िया. बस बना ना पायी, वरदान की गुड़िया; काठ की गुड़िया. माँ के संघर्षो को प्रणाम! बापू तुम सबसे महान! रस्ता ये अलग तुमने ठाना. बेटी को बेटा माना.…

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अंतर्क्लबीय राजनीति

अंतर्क्लबीय राजनीति

पहली प्रस्तावना: मैं अक्सर कहता हूँ कि श्रीकृष्ण एक अच्छे राजनीतिज्ञ थे. यहाँ तक कि उन्होंने ‘फूट डालो, आराम से रहो’ की नीति अपनाई. कौरवों और पांडवों को आपस में लड़ाकर एक पक्ष का साथ दिया और हस्तिनापुर राज्य के पड़ोस में ही द्वारका बसाकर चैन की बंशी बजाने लगे. मथुरा से भाग आये थे…

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क्या तुम मेरे साथ चलोगे?

क्या तुम मेरे साथ चलोगे?

कुबेर का हाथ नहीं है; पर वक़्त की बरसात है. क्या इस सावन मेरे साथ बरसोगे? क्या तुम मेरे साथ चलोगे?   शान्ति की सौगात नहीं है; शोर भरी ये रात है. क्या इस अमावस मेरे साथ डूबोगे? क्या तुम मेरे साथ चलोगे?   सफलता की ज़मानत नहीं है; वादों की बैसाख है. क्या ज़िन्दगी…

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एक पत्र मृत्यु के नाम

एक पत्र मृत्यु के नाम

प्रिय मृत्यु! आख़िरकार तुम आ ही गयीं! जिस चीज़ का डर था वो हो ही गया।अब इससे पहले कि तुम मुझे अपनी बाँहों के आग़ोश में लेकर मेरे होंठों को सदा के लिए चूम लो, मैं कुछ स्वीकार करना चाहता हूँ, तुम्हारी सहेली ज़िन्दगी के बारे में। हमारा प्रेम-प्रसंग चल रहा था, सालों से! तुमने…

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