भारती की ओढनी (ग़ज़ल)

रूढ़ियों के रुग्न सारे क्यूँ अभी तक चढ रहे हैं? भारती की ओढनी में सिलवटें क्यूँ दिख रहे हैं? गिद्ध जिसने नोच डाले, जिस्म के चिथड़े किये थे आज वे ही चीख कर सब लाश आधी कह रहे हैं। इश्क़ के नाॅस्टैल्जिया में कुछ नहीं, बाज़ार था बस बेख़बर ही टूटकर अब हम अकेले चल…

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