मैं और बदलाव

“ये वही सिद्धार्थ शुक्ला है?” “जी नहीं!” मैं वो नहीं जो कल था। मैं वो नहीं हो सकता जो दसवीं या बारहवीं में था। तब मेरा नज़रिया कुछ और था, बारहवीं से साढ़े तीन साल बाद आज मैं अलग तरह से सोचता हूँ, आज से ढाई साल बाद जब इस कॉलेज से निकलूँगा तो कुछ…

Read more मैं और बदलाव

मैं, रिलीजन, और विचारधाराएँ

लोग अक्सर पूछते हैं कि क्या मैं हिन्दू या मुस्लिम विरोधी हूँ, या बीजेपी सपोर्टर, या कम्यूनिस्ट, या वामपंथी, या संघी। मुझे खुद नहीं पता कि मैं क्या हूँ। घर का माहौल सॉफ्ट हिंदुत्ववादी रहा (यह शब्द इसी साल काँग्रेस द्वारा प्रतिपादित हिंदुत्व को दिया गया है)। अतः धार्मिक मामलों में थोड़े-बहुत सनातन संस्कार मिले।…

Read more मैं, रिलीजन, और विचारधाराएँ

लक्ष्मण राव, रामदास और कुछ बातें

दो-तीन दिन पहले मैंने एक उपन्यास पढा। लक्ष्मण राव का “रामदास”। दिल्ली से एक दोस्त खरीद कर लाया था। गाँव के एक लड़के की कहानी है। उपन्यास तो अच्छा है ही, सबसे ज़्यादा आश्चर्य उसके लेखक के बारे में जान कर हुआ। बात उसी लेखक की!लक्ष्मण राव दिल्ली में चाय बेचा करते हैं। पहले मज़दूरी…

Read more लक्ष्मण राव, रामदास और कुछ बातें

गोविंदा और मैं

गाँवों में, कस्बों में कुछ ऐसी गलियाँ होती हैं, जहाँ हमने अपना समूचा बचपन बिताया होता है। आज भी उदास पलों में धीरे-धीरे वहाँ गुज़रे हुए सारे पल सरसराती महकती हवा की तरह गुज़रते हैं और मन अचानक खुश हो जाता है। लेकिन वक्त की सुईयाँ पंख लगाये उड़ती हैं। हमारे पैरों के नीचे वाले…

Read more गोविंदा और मैं

उन कदमों की आहट

मेरे सामने हज़ारों-हज़ार की भीड़ सभागार में खचाखच भरी हुई है। गूँजते शोरों और पसरे हुए अँधेरों से अलग मैं मंच पर आज गायकी का एक सितारा बन गया हूँ। मेरे सारे ख़्वाब कामिल हो गए हैं। मैं धीरे से आँखें बंद करता हूँ, और मुझे वो ख़ास दिन याद आ जाता है जब इस…

Read more उन कदमों की आहट

रंजिश-ए-ख़ामोशी

शांत था मैं उस दिन। इस वाक्य को दोहराते हुए अब मुझे एक महीना होने को था। कारण? किसी अपने की कमी थी। शायद मेरा नाम लेने वाला कोई अपना अब नहीं रहा था। शायद किसी मधुर आवाज़ की खोज थी। कोई ऐसा जो नाम भले ही दिन में एक बार ले, पर जिस दिन…

Read more रंजिश-ए-ख़ामोशी

बड़का अफसर

हर रोज़ की तरह आज फिर कृषि बीज भंडार में बाबा पंडित अपने कुर्सी पर विराजमान थे। वह जात से तो ब्राह्मण थे, मगर उनके पिताश्री की देन थी कि वह आज इस दुकान पर बैठे हैं। आज ग्राहकों के आकर्षण का केंद्र सिर्फ़ उनके दुकान के अव्वल बीज और खाद ही नहीं, बल्कि उनके…

Read more बड़का अफसर

भीड़तंत्र

केश-गुच्छों को पकड़ कर नग्न-तन को खींचता द्रौपदी को ऐसे दुःशासन घसीटे जा रहा, रक्त आते हैं निकलकर वक्ष जिनमें दुग्ध है देख कर सारा तमाशा भीड़ हँसते जा रहा। उस सभा के सब सुधीजन बन गए धृतराष्ट्र हैं कर्णभेदी याचना है पर वधिर सब बन गए, है महज अपराध उसका वो कोई निर्दोष है…

Read more भीड़तंत्र

वेश्यावृत्ति के लिए लड़कियों की तस्करी

पिता का बस वो हाथ बँटाने छोड़ पिता का हाथ चली, पंद्रह सोलह साल की लड़की, एक अजनबी के साथ चली। उस दिनकर में मायूसी है औ’ है शर्म सितारों मे, देखो आज धरा पर लक्ष्मी बिक गयी चंद हज़ारो में। पहुँच गयी उन गलियों में वह, कुछ सहमी कुछ डरी हुई ला पटक दिया…

Read more वेश्यावृत्ति के लिए लड़कियों की तस्करी

प्यार की खोज

पूरा बचपन प्यार-मोहब्बत की पिक्चर देखने में निकल गया। जब बड़े होकर अपने दोस्तों को प्यार के समंदर में गोते लगाते देखा, तो दिल ने दिमाग़ को इश्क़ के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। एक दिन जब उस तिलिस्मी इश्क़ को जानने को मन बेसब्र हो गया, तो निकल पड़ी मैं प्यार की…

Read more प्यार की खोज