रंजिश-ए-ख़ामोशी

शांत था मैं उस दिन। इस वाक्य को दोहराते हुए अब मुझे एक महीना होने को था। कारण? किसी अपने की कमी थी। शायद मेरा नाम लेने वाला कोई अपना अब नहीं रहा था। शायद किसी मधुर आवाज़ की खोज थी। कोई ऐसा जो नाम भले ही दिन में एक बार ले, पर जिस दिन…

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His words were unheard, his voice wasn’t…

His words were unheard, his voice wasn’t…

“Hey, people!”, I said and received gazes from a score of a pair of eyes. “Sir”, he said, and no one saw him in the eye. Similarities between him and I: We both had all our physical characteristics resembling a human being. We both had unkempt hair and not-so-clean clothes. We both were seeking attention. Differences between him…

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रिज़ल्ट का हौवा

रिज़ल्ट का हौवा

29 मई, 2018, हाँ, यही शुभ दिन था जब घर की चिराग कुसुम बेटी की धड़कनें तेज़ हुई जा रही थीं। मन के किसी कोने में उत्साह को दबाये, वो अपनी व्याकुलता का पूरे घर में खुलेआम प्रदर्शन कर रही थी। सूरज सर पे आने लगा था, 11 बज चुके थे परंतु अभी तक माताश्री…

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MMV वाली लड़की

MMV वाली लड़की

“तुम समझते क्यों नहीं हो श्वेतांक शौक़ के लिये लिखना अलग बात है. तुम बहुत अच्छा लिखते हो, लेकिन सिर्फ प्यार भरी शायरी सुनकर पेट की भूख नहीं मिटती, ये कहानियाँ आपकी ख्वाहिशें पूरी नहीं कर सकतीं. सोसाइटी में जीने के लिये एक स्टेटस बना कर चलना पड़ता है. अब या तो तुम कोई कोर्स…

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ख़्वाब की ऐसी-तैसी

ख़्वाब की ऐसी-तैसी

मेरा छोटा भाई सोनू कल मुझसे बार-बार मोहन के बारे में पूछ रहा था। वह जानना चाहता था कि हम दोनों दोस्तों की किश्तियाँ बिलकुल विपरीत क्यों चल रही हैं? मेरे यह बोलने पर कि वह भटक गया, अच्छा माहौल न मिला, सोनू बोलने लगा, ”यह तो कोई बात न हुई। कहानी में तो हमेशा…

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दुर्दशा

दुर्दशा

  (1) सदियों से बेख़्वाब रही स्त्रियों की ठिठकी, सिमटी, मसली-सी बदहाल ज़िन्दगियों में अनहद दुःख रहे हैं। सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स की दीवारों पर बिखरी टिप्पणियों और शेयरिंग्स से यह खुद-ब-खुद ज़ाहिर है कि जल-जलकर बुझ जाना ही औरतों का इतिहास रहा है। यह कहानी है दुःख, दर्द, पीड़ा, अन्याय, संघर्ष और विवशता के अथाह…

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सज़दा

सज़दा

लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के सामने वाली सड़क पर चहल-पहल तेज़ हो गयी है. सुबह के कुछ 9 बजे रहे हैं. और नवाबों के शहर की शहज़ादी साहिबा अभी तक आराम फरमा रहीं हैं. मोहतरमा जबसे हॉस्टल में आयीं हैं तबसे खुद को डॉक्टर समझने लगी हैं, सुबह 4 बजे शब्बा ख़ैर होती है…

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