क्या सोचा था औ’ क्या पाया

क्या सोचा था औ’ क्या पाया

गंगा की धूमिल धारा में, तपते से मरू सहारा में, जेठों में पड़ी दरारों में, बेमौसम के सैलाबों में, तुमको घुटते देख रहा हूँ, मैं भारत हूँ खेद रहा हूँ। ना राम मिले ना मिली ही माया, क्या सोचा था औ क्या पाया। मुन्ना के पंजर दिखते हैं, अम्मा के नैना रिसते हैं, जीवन सर्वत्र…

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इश्क़ तुम्हारा

इश्क़ तुम्हारा

इश्क़ तुम्हारा ग़ज़ल रुबाई, मधुर कहानी, मंद गीत है, लोरी भी है। इश्क़ तुम्हारा चहल-पहल है, कोयल-कलरव, हवा वसंती, बारिश भी है। इश्क़ तुम्हारा दर्शन भी है, डगमग नैया, एक खेवैया, धारा भी है। इश्क़ तुम्हारा राधा भी है, शब्द मौन है, रात अकेली, सिसकी भी है।

कविता (मानव छंद)

कविता (मानव छंद)

कविता समाज का दर्पण अंतर्मन का अर्पण है, साहित्य के अंशुमाली का यह आत्म समर्पण है। अलंकार रस छंद सभी निज भावों की भाषा है, गति-यति-लय मिलन बिंदु पर सुख-दुख की परिभाषा है। व्यथित हृदय प्यासे को ज्यों दरिया देत दिलासा है, लश्तम-पश्तम में हिय निज भरती यह जिज्ञासा है। मदमस्ती मदहोशी है बेहोशी खामोशी…

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सोच

सोच

न जाने ये सोच, इतना क्यों घबराती है? कभी भी सही वक़्त पर, बाहर ही नहीं आती है । अनजानों के सामने तो, सहम-सी जाती है। पर कभी-कभी तो, अपनों से भी लजाती है। बाद में उन पलों को, याद करके पछताती है। कुछ न कर पाने का, अफ़सोस जताती है। मानती हूँ कि तुझे…

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The लफ्ज़ Flux

The लफ्ज़ Flux

बुखार था वीज्ञान का, इंजीनरिंग सिखने लगे, ले सॉफ्टी पी. सी. व एम कि, साहित्य छिकने लगे। मशीन अब भरम, अभिराम शब्द में मिलने लगे, न सी न जावा, कोड भि तुकबंद हम लिखने लगे। न फ़ारमूला, अब ज़ेहन में शायरी टिकने लगे, गणित कहाँ, हम मेहबूबजान को लिखने लगे। शिखर जभी हिलने लगे, कली…

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काठ की गुड़िया

काठ की गुड़िया

काठ की गुड़िया. बचपन का ज़रिया. निर्धन हूँ, बापू की बुचिया. ज़िद कर डाली, लाने को कंचे. बैठा भेड़इया दूर कहीं. ले आये पटरा-सटरा, आकार दिया, दिन रात दिया. कपड़े सिले, पहनाये. हाथ दिया मैं ना मानी; बापू समझाते यही बढ़िया, काठ की गुड़िया. काहे रोती? मत रो बुचिया! बहके मन को जोत दिया. माई ने गोद भरा, कहती—यह सब मोह भरा! मेरी गुड़िया! बापू मेरे भी यही किया; तू भी रख ले, काठ की गुड़िया. कई वर्ष हुए. मैं नर्स हुई. उगते जीवन का हर्ष हुई. नन्ही हथेलियाँ स्पर्श हुईं. मैं स्वावलंबी उत्कर्ष हुई. बापू तुमने साकार किया. सपना मेरा,  विश्वास किया. अर्थ दिए, सामर्थ्य दिए. अब रोज़ बनाती; प्राण की गुड़िया, संसार की गुड़िया, धनवान की गुड़िया, अनजान की गुड़िया. बस बना ना पायी, वरदान की गुड़िया; काठ की गुड़िया. माँ के संघर्षो को प्रणाम! बापू तुम सबसे महान! रस्ता ये अलग तुमने ठाना. बेटी को बेटा माना.…

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क्या तुम मेरे साथ चलोगे?

क्या तुम मेरे साथ चलोगे?

कुबेर का हाथ नहीं है; पर वक़्त की बरसात है. क्या इस सावन मेरे साथ बरसोगे? क्या तुम मेरे साथ चलोगे?   शान्ति की सौगात नहीं है; शोर भरी ये रात है. क्या इस अमावस मेरे साथ डूबोगे? क्या तुम मेरे साथ चलोगे?   सफलता की ज़मानत नहीं है; वादों की बैसाख है. क्या ज़िन्दगी…

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गिरते हुए पुल

गिरते हुए पुल

किसी मंत्री की बीवी के जो पैरों में पड़ी पायल, या उसके हाथ में हीरे जड़ी कोई अंगूठी है। इसी के ख़र्च से झुककर गिरा मेरे शहर में पुल; इसी कंक्रीट में दबकर मरी इक माँ की बेटी है। महीने भर की है तनख़्वाह हज़ारी, तीस या चालीस। उसी अफ़सर के घर में है जो…

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