मैं और बदलाव

“ये वही सिद्धार्थ शुक्ला है?” “जी नहीं!” मैं वो नहीं जो कल था। मैं वो नहीं हो सकता जो दसवीं या बारहवीं में था। तब मेरा नज़रिया कुछ और था, बारहवीं से साढ़े तीन साल बाद आज मैं अलग तरह से सोचता हूँ, आज से ढाई साल बाद जब इस कॉलेज से निकलूँगा तो कुछ…

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लक्ष्मण राव, रामदास और कुछ बातें

दो-तीन दिन पहले मैंने एक उपन्यास पढा। लक्ष्मण राव का “रामदास”। दिल्ली से एक दोस्त खरीद कर लाया था। गाँव के एक लड़के की कहानी है। उपन्यास तो अच्छा है ही, सबसे ज़्यादा आश्चर्य उसके लेखक के बारे में जान कर हुआ। बात उसी लेखक की!लक्ष्मण राव दिल्ली में चाय बेचा करते हैं। पहले मज़दूरी…

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गोविंदा और मैं

गाँवों में, कस्बों में कुछ ऐसी गलियाँ होती हैं, जहाँ हमने अपना समूचा बचपन बिताया होता है। आज भी उदास पलों में धीरे-धीरे वहाँ गुज़रे हुए सारे पल सरसराती महकती हवा की तरह गुज़रते हैं और मन अचानक खुश हो जाता है। लेकिन वक्त की सुईयाँ पंख लगाये उड़ती हैं। हमारे पैरों के नीचे वाले…

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बड़का अफसर

हर रोज़ की तरह आज फिर कृषि बीज भंडार में बाबा पंडित अपने कुर्सी पर विराजमान थे। वह जात से तो ब्राह्मण थे, मगर उनके पिताश्री की देन थी कि वह आज इस दुकान पर बैठे हैं। आज ग्राहकों के आकर्षण का केंद्र सिर्फ़ उनके दुकान के अव्वल बीज और खाद ही नहीं, बल्कि उनके…

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इश्क़ तुम्हारा

इश्क़ तुम्हारा

इश्क़ तुम्हाराग़ज़ल रुबाई,मधुर कहानी,मंद गीत है,लोरी भी है। इश्क़ तुम्हाराचहल-पहल है,कोयल-कलरव,हवा वसंती,बारिश भी है। इश्क़ तुम्हारादर्शन भी है,डगमग नैया,एक खेवैया,धारा भी है। इश्क़ तुम्हाराराधा भी है,शब्द मौन है,रात अकेली,सिसकी भी है।

कविता (मानव छंद)

कविता (मानव छंद)

कविता समाज का दर्पण अंतर्मन का अर्पण है, साहित्य के अंशुमाली का यह आत्म समर्पण है। अलंकार रस छंद सभी निज भावों की भाषा है, गति-यति-लय मिलन बिंदु पर सुख-दुख की परिभाषा है। व्यथित हृदय प्यासे को ज्यों दरिया देत दिलासा है, लश्तम-पश्तम में हिय निज भरती यह जिज्ञासा है। मदमस्ती मदहोशी है बेहोशी खामोशी…

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भारती की ओढनी (ग़ज़ल)

रूढ़ियों के रुग्न सारे क्यूँ अभी तक चढ रहे हैं? भारती की ओढनी में सिलवटें क्यूँ दिख रहे हैं? गिद्ध जिसने नोच डाले, जिस्म के चिथड़े किये थे आज वे ही चीख कर सब लाश आधी कह रहे हैं। इश्क़ के नाॅस्टैल्जिया में कुछ नहीं, बाज़ार था बस बेख़बर ही टूटकर अब हम अकेले चल…

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ख़त

ख़त

  मेरे प्यारे भगवान्, मेरे निराले भगवान्। मेरी तमाम खुशियों के लिए शुक्रिया।हाँ, आप ही को ख़त लिख रहा हूँ। कुछ कहना है आपसे। क्यों कह रहा हूँ, जानते हैं? मैंने यह महसूस किया है कि जब दर्द को शब्द का लिबास मिल जाता है, तो वह थोड़ा कम हो जाता है। मैं जानता हूँ…

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ख़्वाब की ऐसी-तैसी

ख़्वाब की ऐसी-तैसी

मेरा छोटा भाई सोनू कल मुझसे बार-बार मोहन के बारे में पूछ रहा था। वह जानना चाहता था कि हम दोनों दोस्तों की किश्तियाँ बिलकुल विपरीत क्यों चल रही हैं? मेरे यह बोलने पर कि वह भटक गया, अच्छा माहौल न मिला, सोनू बोलने लगा, ”यह तो कोई बात न हुई। कहानी में तो हमेशा…

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दुर्दशा

दुर्दशा

  (1) सदियों से बेख़्वाब रही स्त्रियों की ठिठकी, सिमटी, मसली-सी बदहाल ज़िन्दगियों में अनहद दुःख रहे हैं। सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स की दीवारों पर बिखरी टिप्पणियों और शेयरिंग्स से यह खुद-ब-खुद ज़ाहिर है कि जल-जलकर बुझ जाना ही औरतों का इतिहास रहा है। यह कहानी है दुःख, दर्द, पीड़ा, अन्याय, संघर्ष और विवशता के अथाह…

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