सोच

सोच

न जाने ये सोच, इतना क्यों घबराती है? कभी भी सही वक़्त पर, बाहर ही नहीं आती है । अनजानों के सामने तो, सहम-सी जाती है। पर कभी-कभी तो, अपनों से भी लजाती है। बाद में उन पलों को, याद करके पछताती है। कुछ न कर पाने का, अफ़सोस जताती है। मानती हूँ कि तुझे…

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