दो-तीन दिन पहले मैंने एक उपन्यास पढा। लक्ष्मण राव का “रामदास”। दिल्ली से एक दोस्त खरीद कर लाया था। गाँव के एक लड़के की कहानी है। उपन्यास तो अच्छा है ही, सबसे ज़्यादा आश्चर्य उसके लेखक के बारे में जान कर हुआ। बात उसी लेखक की!
लक्ष्मण राव दिल्ली में चाय बेचा करते हैं। पहले मज़दूरी किया करते थे। अब अपनी चाय की दुकान पर ही अपनी लिखी किताबें भी बेचा करते हैं। पढने का शौक था, तो उन्होने पचास-पचपन साल की उम्र में बी.ए. भी कर लिया है।

शुरुआत में मैं सिर्फ़ गद्य ही लिखता था। कुछ समय पहले से पद्य में आया। यह जानते हुए भी कि मेरी कलम गद्य के लिए ही बनी है, मैंने कई महीनों से कोई कहानी नहीं लिखी। ‘दुर्दशा’, ‘ख़्वाब की ऐसी-तैसी’, ‘ख़त’ लोगों को बहुत पसंद आई। मेरे दादाजी को भी, जिनकी प्रेरणा से ही मैं कुछ भी लिखता हूँ। लेकिन मुझे अपनी रचनाओं में जीवन की कमी लगती थी। उन कमियों को सुधारने के बाद ही अगली कहानी लिख पाऊँगा। हाँ, तो मैं बात कर रहा था लक्ष्मण राव की। “रामदास” में कोई भावुकता नहीं। सिर्फ़ कुछ अपने आस-पास के ही प्रतीत होते किरदार, दैनिक जीवन के ही शब्द और सीधे-सादे अंदाज़ में प्रस्तुत की गई घटनाएँ। लेकिन क्या ज़ादू है! बाद में पता चला कि यह लेखक के गाँव की ही सच्ची घटनाओं पर आधारित है। दरअसल उन्होंने अपनी अधिकांश रचनाएँ सच्ची घटनाओं पर ही लिखी हैं, तमाम बारीकियों के साथ। जैसे, उनकी चाय के दुकान पर कुछ लोग एक बहुत ही शर्मीली लड़की के बारे में बात किया करते थे। उसी लड़की पर उन्होंने एक उपन्यास लिखी “रेणु”।

इन बातों से मुझे एक बड़ी ही अच्छी शिक्षा मिली। दरअसल प्रकृति ने हमें जो अनुभूति की अनंत शक्ति दी है न, वह हम लेखकों के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। हमारी अनुभूति जितनी अधिक नैसर्गिक होगी, तीक्ष्ण होगी, व्यापक होगी, हमारी रचनाएँ उतनी ही अच्छी होंगी। ख़ुद-ब-ख़ुद शब्द-शब्द में एक नये रस का संचार दिखाई पड़ेगा।

हमारे आस-पास इतनी सारी घटनाएँ होती रहती हैं, इतने सारे लोगों से हम मिलते-जुलते रहते हैं। लेखकों को अपनी इंद्रियाँ हमेशा खुली रखनी चाहिए। यह तो सब जानते-मानते हैं कि हमारी रचनाएँ कल्पना और हमारे मानस-पटल पर आस-पास की घटती घटनाओं के हस्ताक्षर के समावेश से जन्म लेती हैं। कल्पना शक्ति यदि अच्छी हो, तो बेहद उम्दा रचनाएँ लिखी जा सकती हैं। लेकिन वह रचना कोई और भी लिख सकता है। वहीं जो रचनाएँ हमारे नैसर्गिक अनुभव की उपज होती हैं, उसे कोई और नहीं लिख सकता। मैंने “दुर्दशा” लिखी। अच्छी थी, लेकिन उसे कोई और भी लिख सकता है। “ख़त” कोई और नहीं लिख सकता। वह निजी मेरी है।

इसके अलावे लक्ष्मण राव की कहानी हमें यह भी बताती है कि लेखक बनना कोई मुश्किल काम नहीं है। बस ज़रुरत है ख़ुद के प्रति, एहसासों के प्रति, ज़ज़्बात के प्रति ईमानदार होने की।

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About Saket Bihari

बिहार के शिवहर जिले में बागमती नदी के किनारे एक गाँव आबाद है पहाड़पुर। वह गाँव जहाँ एक ब्राह्मण परिवार में मेरा जन्म हुआ। पला-बढा। नौवीं में था, जब हमारे नवोदय विद्यालय में हिन्दी क्लब बनाया गया। हिन्दी में शायद सबसे अच्छा और मशहूर था उस समय। क्लब का कैप्टन बना दिया गया। और शायद मेरे साहित्यिक जीवन की शुरुआत भी यही से मुझे मानना चाहिए। वैसे साहित्य में रुचि बचपन से ही रही है। चौथी-पाँचवीं में ही डायरी लिखना शुरु कर दिया था। वहाँ अपनी संवेदनाऍ अभिव्यक्त करता था। लेकिन हाँ, छुपकर लिखता था। डायरी मेरा सबसे अच्छा साथी था, जहाँ मैं अपने आप से भी छुपाए हुए राज़ आहिस्ता-आहिस्ता उतारकर उन्हें निहार सकता था। एक दिन चोरी से कुछ दोस्तों ने मेरी डायरी पढ ली। उसके बाद मैंने कभी डायरी न लिखने की क़सम खा ली। कई साल बाद फिर से डायरी लिखना शुरु किया। अपने विचारों को काग़ज़ पर उतारने की प्रतिभा वही से आई। घर मेंं भी बड़ा अच्छा साहित्यिक माहौल था। मेरे दादाजी श्री इंद्रदेव तिवारी 'द्विजदेव' एक सेवानिवृत्त शिक्षक, कवि, गीतकार, गायक और हारमोनियम वादक हैं। साहित्य के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए जिला और राज्य स्तर पर कई बार सम्मानित किए जा चुके हैं। मेरी बड़ी दीदी ओमी रानी भी सुन्दर कविताएँ लिखती हैं। इस प्रकार रचनात्मक लेखन के प्रति मेरा झुकाव एक स्वाभाविक घटना थी। एक कारण और भी है। बचपन से लेकर आज तक मेरी अंतर्मुखता ने कभी मेरा पीछा न छोड़ा। ऐसे में कलम की स्याही बड़ी मददगार साबित होती है। इ जो लिखने का रस्ता है न, बड़ा इंटेरेस्टिंग है। बोले तो एकदम क़यामत टाईप। फिलिम में जूही चावला अपनी सहेली सब के साथ जइसन रस्ता से पिकनिक मनाने जाती है न, एकदम ओएसा ही रस्ता है, डिट्टो। जब कभी भी बोर हो जाता हूँ, तो रचनात्मक लेखन का सहारा लेता हूँ। एक सपनों की दुनिया बनाता हूँ। एक ऐसी दुनिया, जिसमें मैं सिर्फ़ साकेत बिहारी होता हूँ। कोई नक़ाब नहीं। मेरे अपने किरदार होते हैं। मेरे हिसाब से घटनाएँ घटती हैं। उस फिल्म का निर्देशक भगवान नहीं, मैं होता हूँ। मैं ज़्यादातर अपने लेखन में अपने हृदय के निकट के विषयों को उठाता हूँ। मेरी रचनाएँ कहीं-न-कहीं अपनी आसपास की घटती घटनाओं के मन पर अंकित हस्ताक्षरों और कल्पना का समावेश है। अभी आई.आई.टी.(बी.एच.यू.) में रासायनिक अभियांत्रिकी की पढाई कर रहा हूँ। लिखने का यह सिलसिला अब तक जारी है और ताज़िंदगी रहेगा, ऐसा मेरा प्लेटिनिक-विश्वास कहता है।

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