लोग अक्सर पूछते हैं कि क्या मैं हिन्दू या मुस्लिम विरोधी हूँ, या बीजेपी सपोर्टर, या कम्यूनिस्ट, या वामपंथी, या संघी। मुझे खुद नहीं पता कि मैं क्या हूँ। घर का माहौल सॉफ्ट हिंदुत्ववादी रहा (यह शब्द इसी साल काँग्रेस द्वारा प्रतिपादित हिंदुत्व को दिया गया है)। अतः धार्मिक मामलों में थोड़े-बहुत सनातन संस्कार मिले। मैंने बचपन से ही ये मानना शुरू कर दिया था कि कुछ भी निरपेक्ष रूप से सही या ग़लत नहीं है। सब कुछ रिलेटिव है और यही सापेक्षिकता (रिलेटिविटी) एक दिन मानवीय जिज्ञासा का अंत होगी। इस पर विस्तृत चर्चा फिर कभी।

चूँकि कुछ भी एब्सोल्यूट सही-गलत नहीं, तो ऐसे में किसी एक विचारधारा से चिपके रहना आपके व्यक्तित्व के विकास में बाधा है। हर विचारधारा की कुछ बातें अच्छी होंगी और कुछ ख़राब, वो भी सापेक्ष। रिलीजन शब्द का इस्तेमाल इसलिए क्योंकि हिंदी के धर्म शब्द का अर्थ अंग्रेज़ी के रिलीजन से कहीं ज़्यादा विस्तृत और गहरा है। मैंने अपने जीवन में रिलीजन को सिरे से नकार दिया है। और यह भी मानता हूँ कि विचारधाराएँ जब आत्म-मंथन से मुक्त, आत्ममुग्धता व आत्मश्लाघा से ग्रसित होकर आलोचनाओं और परिवर्तन का प्रतिरोध करने लगती हैं तो रिलीजन हो जाती हैं। ये ‘रिलीजन विदऑउट गॉड’ हैं। या शायद कोई ईश्वर बना लिया हो जैसे मार्क्स, गाँधी, सावरकर, अम्बेडकर। पता नहीं शायद।

रिलीजन को केवल श्रद्धा चाहिए। श्रद्धालु ईश्वर की हर बात को आँख मूँद कर मान लेते हैं और ईश्वर या उनके रिलीजन को मिलने वाली गालियों से उनकी भावनाएँ आहत होती हैं। यही सेंटीमेंट्स का हर्ट होना आपको श्रद्धालु बनाता है। मैं इसी श्रद्धा से बचता हूँ।

-सिद्धार्थ शुक्ला

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