“ये वही सिद्धार्थ शुक्ला है?”
“जी नहीं!”
मैं वो नहीं जो कल था। मैं वो नहीं हो सकता जो दसवीं या बारहवीं में था। तब मेरा नज़रिया कुछ और था, बारहवीं से साढ़े तीन साल बाद आज मैं अलग तरह से सोचता हूँ, आज से ढाई साल बाद जब इस कॉलेज से निकलूँगा तो कुछ अलग नज़रिया होगा। ये परिवर्तन सतत है और आवश्यक भी।

जो कविता या ग़ज़ल कल लिखी थी, आज उसमें मुझे अपरिपक्वता दिखती है। यह क्या है? जो निर्णय कल लिए थे, आज बचकाने लगते हैं। जो कल कहा था, आज बेवकूफ़ी लगती है। हम कल साथ थे क्योंकि हमारी फ्रीक्वेंसी बराबर थी तो हम रेजोनेंस में थे। आज हमारी फ्रीक्वेंसी अलग है, हम साथ-साथ ऑसिलेट नहीं कर सकते।

बदलावों को लेकर मैं हमेशा उदारवादी रहा। बदलावों से मैं कभी अपने अहम् (ईगो) को नहीं जोड़ पाया। मुझे सकारात्मक परिवर्तन हमेशा आवश्यक और स्वागतयोग्य लगे। इस बदलाव में ध्यान देने की बात यह है कि व्यक्तित्व का आधारभूत ढाँचा नहीं बदल रहा, केवल दृष्टिकोण बदल रहा है। इच्छाएँ बदल रही हैं। ख़्वाहिशें बदल रही हैं। सपने वहीं हैं। और आखिर में बदलने में और हार मान लेने में एक महीन अंतर है। बदलने और धोखेबाज़ी में एक बड़ा अंतर है।

परिवर्तन प्रकृति का नियम है। ― गीता

-सिद्धार्थ शुक्ला

About Saket Bihari

बिहार के शिवहर जिले में बागमती नदी के किनारे एक गाँव आबाद है पहाड़पुर। वह गाँव जहाँ एक ब्राह्मण परिवार में मेरा जन्म हुआ। पला-बढा। नौवीं में था, जब हमारे नवोदय विद्यालय में हिन्दी क्लब बनाया गया। हिन्दी में शायद सबसे अच्छा और मशहूर था उस समय। क्लब का कैप्टन बना दिया गया। और शायद मेरे साहित्यिक जीवन की शुरुआत भी यही से मुझे मानना चाहिए। वैसे साहित्य में रुचि बचपन से ही रही है। चौथी-पाँचवीं में ही डायरी लिखना शुरु कर दिया था। वहाँ अपनी संवेदनाऍ अभिव्यक्त करता था। लेकिन हाँ, छुपकर लिखता था। डायरी मेरा सबसे अच्छा साथी था, जहाँ मैं अपने आप से भी छुपाए हुए राज़ आहिस्ता-आहिस्ता उतारकर उन्हें निहार सकता था। एक दिन चोरी से कुछ दोस्तों ने मेरी डायरी पढ ली। उसके बाद मैंने कभी डायरी न लिखने की क़सम खा ली। कई साल बाद फिर से डायरी लिखना शुरु किया। अपने विचारों को काग़ज़ पर उतारने की प्रतिभा वही से आई। घर मेंं भी बड़ा अच्छा साहित्यिक माहौल था। मेरे दादाजी श्री इंद्रदेव तिवारी 'द्विजदेव' एक सेवानिवृत्त शिक्षक, कवि, गीतकार, गायक और हारमोनियम वादक हैं। साहित्य के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए जिला और राज्य स्तर पर कई बार सम्मानित किए जा चुके हैं। मेरी बड़ी दीदी ओमी रानी भी सुन्दर कविताएँ लिखती हैं। इस प्रकार रचनात्मक लेखन के प्रति मेरा झुकाव एक स्वाभाविक घटना थी। एक कारण और भी है। बचपन से लेकर आज तक मेरी अंतर्मुखता ने कभी मेरा पीछा न छोड़ा। ऐसे में कलम की स्याही बड़ी मददगार साबित होती है। इ जो लिखने का रस्ता है न, बड़ा इंटेरेस्टिंग है। बोले तो एकदम क़यामत टाईप। फिलिम में जूही चावला अपनी सहेली सब के साथ जइसन रस्ता से पिकनिक मनाने जाती है न, एकदम ओएसा ही रस्ता है, डिट्टो। जब कभी भी बोर हो जाता हूँ, तो रचनात्मक लेखन का सहारा लेता हूँ। एक सपनों की दुनिया बनाता हूँ। एक ऐसी दुनिया, जिसमें मैं सिर्फ़ साकेत बिहारी होता हूँ। कोई नक़ाब नहीं। मेरे अपने किरदार होते हैं। मेरे हिसाब से घटनाएँ घटती हैं। उस फिल्म का निर्देशक भगवान नहीं, मैं होता हूँ। मैं ज़्यादातर अपने लेखन में अपने हृदय के निकट के विषयों को उठाता हूँ। मेरी रचनाएँ कहीं-न-कहीं अपनी आसपास की घटती घटनाओं के मन पर अंकित हस्ताक्षरों और कल्पना का समावेश है। अभी आई.आई.टी.(बी.एच.यू.) में रासायनिक अभियांत्रिकी की पढाई कर रहा हूँ। लिखने का यह सिलसिला अब तक जारी है और ताज़िंदगी रहेगा, ऐसा मेरा प्लेटिनिक-विश्वास कहता है।
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