पिता का बस वो हाथ बँटाने छोड़ पिता का हाथ चली,
पंद्रह सोलह साल की लड़की, एक अजनबी के साथ चली।
उस दिनकर में मायूसी है औ’ है शर्म सितारों मे,
देखो आज धरा पर लक्ष्मी बिक गयी चंद हज़ारो में।

पहुँच गयी उन गलियों में वह, कुछ सहमी कुछ डरी हुई
ला पटक दिया बन्द कमरे में, थी सेज जहाँ पर सजी हुई।
आती है हर दिन सूर्य किरण पर सुबह कभी ना आती,
होकर उन शोषित गलियों से काली निशा काँप जाती।

घोर यातनाओं को सहती कैसे रक्षा करे अहं की,
खूब घसीटा केश पकड़कर देह बिकने लगी स्वयं की।
हो गए कैद वो सपने सारे, थी जिनको चाह गगन की
तोड़ के पिंजर मैं उड़ जाऊँ ,पर न चली अपने मन की।

साथ साथ में हर आँसू के हर एक ख़्वाब मेरा बहता,
फिर भी कुछ पैसों की ख़ातिर, ये चेहरा खिलता रहता।
कोई बहन कोई बेटी तो कोई किसी के माँ के जैसी,
सिर्फ़ नहीं मैं यहाँ अकेली और भी है मेरे जैसी।

नहीं किसी को हमसे मतलब,भूख मिटाते सब तन की
चलती फिरती लाशें है हम,फ़िक्र नही किसी को मन की।
चीख-चीख कर कहते हो तुम, बहुत तुच्छ है तेरी दुनिया
पर थोड़ा खुद से भी पूछो,बनाई किसने मेरी दुनिया?

अपनी बीवियों से तो छुपकर, मेरे बिस्तर तुम हो सोते
बदनाम बता फिर गलियों को, चरित्रहीन मुझको कहते।
पर नहीं क्या मेरा चरित्र ये, है समाज की लाचारी
बिक रही थी कहा थे तब तुम नैतिकता के अनुचारी?

बन्द कर अब तो ढोंग तेरा हटा नकाबे देख ज़रा,
दाग लगाने से पहले खुद गिरेबान में झाँक जरा
गर मैं हूँ बदनाम वैशया चरित्रहीन व नग्न बदन,
मुझसे भी है बड़ी तवायफ़ देख ज़रा तू अपना मन।

वह दुष्ट दुशासन द्रौपदी को, महासभा में जब लाया
तब तो वहाँ कृष्ण ने आकर, नारी का मान बचाया।
साथ नही अब कृष्ण का होगा,पर अर्जुन! लड़ना होगा
बिके न लक्ष्मी बाज़ारो में, ध्यान तुमको रखना होगा
धर कर हाथ यूँ बैठ न सकते,कुछ तुमको करना होगा
हाँ अर्जुन! लड़ना होगा..अब तुमको लड़ना होगा..

-जिनल जैन (द्वितीय वर्ष)

Like & Share this post

Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *