शांत था मैं उस दिन। इस वाक्य को दोहराते हुए अब मुझे एक महीना होने को था। कारण? किसी अपने की कमी थी। शायद मेरा नाम लेने वाला कोई अपना अब नहीं रहा था। शायद किसी मधुर आवाज़ की खोज थी। कोई ऐसा जो नाम भले ही दिन में एक बार ले, पर जिस दिन ना ले तो लगे ऐसा मानो कि सैकड़ों पन्नों की किताब अभी भी बेनाम है। बेनाम है वो किताब जिसने शायद उसके लेखक को भी नाम दिया। बेनाम है वो किताब जिसे झाड़ने वाले मालिक मिले, पर पोसने वाले वाचक नहीं।

नाम की तलाश में मैं किताब संपादक ढूँढते-ढूँढते एक दिन खड़ा था उस जगह के बाहर जिसका नाम भाषा से नहीं, उम्रवर्ग से बदलता है ― बचपन में मशगूल मुम्बई सा, जवानी में रूमानी कश्मीर सा, और बुढ़ापे में शीतल रामेश्वरम सा। ‘महोगनी उपवन’ नाम के उस बाग से मुझे भी कुछ महोगनी उम्मीदें थीं। उम्मीदों को दिल में छुपाए, कदमों से झाँकते साये, बेमन कुछ गुनगुनाए चले जा रहा था मैं, डूबने को उस हरियाली में ― शायद इश्क़ का रंग सफ़ेद हरदम नहीं होता।

कुछ अलग था उस बगीचे में। झूलने को बस बरगद की शाखा, खेलने को बस मटमैली गिलहरियाँ। लड़कपन की कमी थी शायद। पर बेंचें थीं ― एक-दो नहीं, काफ़ी थीं। कहीं बेंच पर बैठकर ही लड़कपन महसूस तो नहीं होता? मैंने पहली बेंच पकड़ी और बैठ गया ख़ुदको समेट कर। जैसे-जैसे हवाओं ने अपनी अदा बदली, मेरा बदन भी झूमने लगा। बैठे-बैठे फ़ोन पर लगे भी कोई झूम सकता है क्या? जब हवाओं से हारोगे, तब शरीर की हड्डियों को भी ये मानना पड़ेगा। अब तक मेरी हड्डियों की हार का साक्षी अकेला मैं ही था। इसलिए फ़ोन के कैमरे से महोगनी दृश्य कैद करने लगा, कि तभी फ़ोन ने कुछ आवाज़ किया। ‘इट्स अ मैच!‘ ― ऑनलाईन रूमानी एप्प पर किसी लड़की ने बात करने के लिए हामी भरी थी। पर उस लड़की की कोई तस्वीर तो थी नहीं। फिर मैंने उसे पसंद कैसे किया? तब नज़र उसके परिचय पर पड़ी और गहन मेरी याद्दाश्त पर। उसने लिख रखा था ―

“लेखिका हूँ, तस्वीरों से तकरार करती हूँ।
लब बिना ही, मैं तहरीरों से वार करती हूँ।”

शायद इसी बहर में घोल ज़हर उस दिन कहर बरपा रही थी वो। ये बताओ कि 206 हड्डियों में से सबसे ज़िद्दी कौनसी है? अरे! अँगूठों वाली। हवाएं भी उन्हें फ़ोन पे टाइप करने से रोक नहीं पा रही थीं। अब हवाओं से बेवफ़ाई करने का लाज़मी कारण जो मिल गया था। मन में था कि कुछ ज़बरदस्त रिप्लाई दिया जाए। कुछ सोचकर मैंने लिखा ―

“दूँ चमक तेरे हर लफ़्ज़ों को मैं, अगर बोलो।
दिल निशाने पर मेरे ही, संघार करती हूँ।”

उसने कहा, “हाय! जवाब पढ़कर मज़ा आया।” मैंने धन्यवाद दिया, कि तभी कहती है, “दोस्ती की शुरुआत ही जंग से करना चाहते हो?”

“किसने कहा मैं दोस्ती की चाहत लाता हूँ। मैं तो जंग ही चाहता हूँ। आलम ऐसा है कि जंग में सबकुछ जायज़ होता है, दोस्ती में नहीं।” जंग का मेरा बस इतना ज़िक्र था कि इक घातक हथियार मुँह पे पड़ा। दुपट्टा था। दुपट्टा हटाते हुए दाईं ओर मेरी नज़र गयी तो देखा कि दुपट्टों के बदले दिलों का सौदा करने वाली एक हमउम्र सुंदरी मेरी ही बेंच पर बैठी थी। मैं अचम्भित था। मुँह से मेरे निकल गया, “ये वोडाफ़ोन का नेटवर्क सिर्फ़ इसी बेंच पर आता है क्या?” वो मुस्कराकर फिर से अपने फ़ोन में व्यस्त हो गयी। वो दिन भी क्या दिन था, जब दो जंग मैं एक ही मैदान पे खेल सकता था। पर मैंने जोश में होश न खोकर अल्फ़ाज़ का जंग जारी रखा। आख़िर दुपट्टे के जवाब में मेरे पास कोई हथियार जो नहीं था।

फिर फ़ोन बजा। उसी लेखिका का संदेश था। “जंग के मैदान में पायल से बैर मज़ाक लगता है तुम्हें?” क्या कहना चाह रही थी वो? ओह! मैं भी सरफिरा। नाम उसका पायल ही तो था ― पायल शर्मा। मैंने लिखा ― “बैर भले ही पायल से हो, मगर दोस्ती धुन से कर लो, तो जीत छीनने वाला भी हार महसूस करने लगता है।”

कभी किसी की मुस्कान से निकली साँस की महक दिल को छूई है? मुझे छूई, उसी पल। उसी दुपट्टेवाली की थी। अब यहाँ एक बड़ा प्रश्न आता है, कि उसकी मुस्कान की कुंजी किस गुच्छे में थी? क्या वो मेरा रूप देख हँस रही थी? नहीं, वरना वो उठकर चली जाती। क्या वो हरियाली देख मुस्का रही थी? नहीं, वहाँ की तितलियाँ इतनी बदमाश कहाँ थीं। क्या वो फ़ोन से मन बहला रही थी? शायद, पर उसने नैन मेरी ओर क्यूँ फ़िराए थे? मैं घोर असमंजस में था। इससे पहले मैं उससे कुछ पूछता, उसने आँख फिर फ़ोन में गड़ा लिए। जैसे ही फ़ोन पे उसने कुछ टाइप किया, फ़ोन मेरा बजने लगा। देखा तो पायल का जवाब आया था ― “सिर्फ़ मेरे मुस्कराने से क्या तुम धुन पकड़ लोगे, क्योंकि मैं बोलूँगी नहीं?”

मेरा शक बढ़ता जा रहा था। मैंने लिखा ― “तुम कहाँ हो अभी?” उसका जवाब था ― “बाग का नाम तो नहीं पता, पर कोई लड़का यहाँ मेरे दुपट्टे से धुन चुरा रहा है।”

मेरी रूह मुस्कुरा रही थी। अंदर से मायूसी भी थी कि जिन्हें मैं दो अलग विपक्षी समझ बैठा था, वो असल में एक ही सुंदरी के दो अलग दिशाओं से भेद रहे हथियार थे। पर उस लड़की के जवाबों का दीवाना हो गया था मैं। मैंने उसे फ़िर लिखा ― “जब बैठी हो तुम बगल, तो बात फ़ोन पे क्यूँ?” उसके जवाब ने मेरी चिंता और बढ़ा दी, जब उसने लिखा ― “तुम बहुत बातूनी हो, और एक मैं हूँ जिसे बात करना नहीं आता।” जब तक मैं आगे कुछ करता, एक बिल्ली ने उसका दुपट्टा बड़ी बेरहमी से खींचा।

कभी किसी के मुख से निकली साँस की महक दिल को छूई है? मुझे फ़िर छूई, पर क्या ये महक का दोष है जो मेरे कानों तक कोई सनसनी नहीं पहुँची। दुपट्टा जाने की झल्लाहट में उसके होठ हिले ज़रूर, पर आवाज़ ने निकलने से साफ़ मना कर दिया। ऐसी रंगीन लड़की जो शब्दों से कायल कर दे, हुस्न से घायल कर दे, नाम में पायल कर दे, वह बोल नहीं सकती थी।

पर क्या मैं निराश था? बिल्कुल नहीं! मैं उसके जवाबों का शागिर्द था, और जवाब देने का सिर्फ़ स्वर ही माध्यम तो नहीं होता। पर मेरे इस विचार को दर्शाने में शायद मेरे चेहरे को कष्ट हो रहा था। शायद मुझसे कहीं ग़लती हो रही थी। उसके चेहरे की खोई मुस्कान मेरी ग़लती को बख़ूबी आरोपी बता रहे थे। ये क्या हो रहा था? मुझ किताब को ऐसी ही लेखिका की तो तलाश थी। वो मुझे सँवारने को तैयार थी; मैं ख़ुद नाम पाने को बेक़रार था। पर शायद उसे लगा कि नामकरण आवाज़ के बिन मुनासिब नहीं। हाँ, हिचकिचाहट का भला कारण और क्या होगा। मेरी आँखों के सामने वो उस बेंच से उठ रही थी ― उस ऐतिहासिक बेंच से जिसने मेरे पन्नों में गुदे अधमरे अल्फ़ाज़ को प्राण दिए थे। मैं उसे रोकना चाहता था, पर ध्वनि उढ़ेलने की मेरी ताकत भी शायद वो ले जा रही थी। मूकता ध्वनि से नहीं, सोच से आती है ― ये बात मैं उसे समझा न सका। मुझसे बड़ा मूक कौन होगा भला? वो बेदिल चेहरे से उठ, अपने होठों को मेरे गालों पर महसूस करा, बिन कुछ बात किए मुझे छोड़ जा रही थी। इच्छा होते हुए भी मैं उसे परेशान न कर सका। मन में मलाल ये था कि एक ही बाग था, एक ही बेंच थी, मगर करार ऐसा था कि उसने भी मुझसे बात न की और मैंने भी उसे परेशान न किया।

– तनय केडिया

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मैं शायर तो नहीं, but your curvy brows infused poesy.

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