केश-गुच्छों को पकड़ कर नग्न-तन को खींचता
द्रौपदी को ऐसे दुःशासन घसीटे जा रहा,
रक्त आते हैं निकलकर वक्ष जिनमें दुग्ध है
देख कर सारा तमाशा भीड़ हँसते जा रहा।

उस सभा के सब सुधीजन बन गए धृतराष्ट्र हैं
कर्णभेदी याचना है पर वधिर सब बन गए,
है महज अपराध उसका वो कोई निर्दोष है
और अफ़वाहों को सुनकर टूट उस पर जन गए।

हाय! मानवता ये कैसी, कितना निर्मम दृश्य है,
भीड़तंत्रों के हवाले हो गया यह देश है।

आ रहे अख़बार लथपथ रोज़ काले खून से
दूरदर्शन का प्रसारण भी वही दिखला रहा,
था कभी उद्घोष जिनका ‘वसुधैव-कुटुम्बकम्’
‘मॉब लिंचिंग’ का वो नारा हर गली चिल्ला रहा।

आदमी का आदमी से हो गया विद्वेष है,
भीड़तंत्रों के हवाले हो गया यह देश है।

ये प्रथा नूतन नहीं बल्कि अतिप्राचीन है,
जब अकेला लड़ रहा अभिमन्यु था कुरुक्षेत्र में,
कर्ण, दुर्योधन, दु:शासन, अश्व-स्थामा, शल्य औ’
मामा शकुनि, द्रोण, जयद्रथ; ने किया वध क्षेत्र में।

चाहे द्वापर, चाहे कलियुग, ये वही परिवेश है,
भीड़तंत्रों के हवाले हो गया यह देश है।

एक मैसेज फैलता है एक घर से दूसरे
नुक्कड़ों पर नाच नंगा करने को तैयार सब,
रस्सी, डंडा, लाठी, बरछी, चाकू, पत्थर और कुछ
स्मार्टफ़ोने हाथ में हैं, उनके ये हथियार सब।

ये सदी इक्कीस पर बुद्धि नहीं अब शेष है,
भीड़तंत्रों के हवाले हो गया यह देश है।

और तो डरता हूँ मैं किसी बच्चे से भी मिलने से,
कैसे अजनबियों से पूछूँ-“कौन-सा ये शहर है?”
जाने कब अंधी जमातें मौत बन बरसें, कहें-
“ये वो बच्चाचोर है जिसका शहर में कहर है!”

‘अतिथि-देवो-भव’ के पूजक अजनबी से तैश हैं,
भीड़तंत्रों के हवाले हो गया यह देश है।

रोज़ मरता है ख़ुदा जब लोग मरते दंगों में,
धर्म के ठिकदारो ने न धर्म को ही बख़्शा है,
फूँके बस,जो जान ले औ’ शक पे किसीको मार दे
‘रक्षकों’ ये कौन-सी, कैसी तुम्हारी रक्षा है?

मिल चुका गिद्धों को जब है हुक्मरानों का शरण
क्यों किसी निर्बल को वो ना नोच के खा जाएँगे,
जब हो कट्टरता पले, सत्ता के सिंहासन तले
एक दिन जनतंत्र से कबीलाई हम हो जाएँगे।

ये सियासतदान हैं जो आदमी में क्लेश है,
भीड़तंत्रों के हवाले हो गया यह देश है।

हिन्दू लड़की जब करे यूँ मुसलमाँ से प्यार भी
या मुसलमाँ लड़की के संग हिन्दू लड़का साथ हो,
जाने कब होगा की देखे चाहे पंडित, मौलवी
प्रेम दिखे, सामूहिक हिंसा की ना कोई बात हो।

लोग कहते हैं कि चेहरा भीड़ का होता नहीं
ढूँढ सबको कैसे करता मौत का तब काम ये,
जान जब लेकर किसी की सोचते ये क्या किया
पीछे चेहरा बैठ वो देता कुटिल मुस्कान है।

है न मंज़िल, ना हीं रस्ता, ना कोई उद्देश्य है,
भीड़तंत्रों के हवाले हो गया यह देश है।

औ’ यहाँ पर आपने है जब तलक कविता सुनी
मॉब-लिंचिंग से किसी की कत्लोगारत हो गयी,
इस अदालत भीड़ की ने फ़ैसला देकर कहा-
“आज के इस सत्र की यहीं पर समाप्ति हो गयी।”

जो था मुंसिफ़ बन के क़ातिल सामने में पेश है,
भीड़तंत्रों के हवाले हो गया यह देश है।

About Aman Sharma

कबसे से खुद को जानने की कोशिश कर रहा हूँ, कोई बतला दे मुझे ये मोहब्बत इस जहाँ में नहीं तो किस जहाँ में है, कोई दिला दे मुझे । किसी दिन फुर्सत में होंगें तो लिखेंगे खुद के बारे में फ़िलहाल की ख़ातिर हमारे लफ़्ज़ काफ़ी हैं । कवि, लेखक या शायद कुछ भी नहीं ।
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