हर रोज़ की तरह आज फिर कृषि बीज भंडार में बाबा पंडित अपने कुर्सी पर विराजमान थे। वह जात से तो ब्राह्मण थे, मगर उनके पिताश्री की देन थी कि वह आज इस दुकान पर बैठे हैं। आज ग्राहकों के आकर्षण का केंद्र सिर्फ़ उनके दुकान के अव्वल बीज और खाद ही नहीं, बल्कि उनके छोटे बेटे ऋषित हैं, जिन्हें सब प्यार से मुन्ना कहकर पुकारते हैं। वह आज रविवार के दिन दुकान में खेलते हुए दिख रहे थे। पूछे जाने पर कहते कि “आज मैं पिताजी की मदद करूंगा।” अब वह मदद कर रहे थे या आफ़त ला रहे थे, यह तो बाबा पंडित ही जाने।

अभी दुकान की बोहनी भी नहीं हुई थी कि कालूराम दुकान पर पधारते हैं। उनके हाथ में दही से भरी एक कहंतरी थी जिसे वह बाबा पंडित के लिए लाए थे। एक दलित के हाथों से दही लेना बाबा पंडित को शोभा तो नहीं देता, मगर वह कालूराम का दिल रखने के लिए उसे स्वीकार करते हैं। कालूराम बाबा को नमस्कार कर शहर की ओर चले जाते हैं। मुन्ना द्वारा पूछे जाने पर बाबा पंडित बताते हैं कि कालूराम सड़क उस पार झोपड़ी में रहता है। उसके चारों लड़के अपने-अपने परिवार समेत शहर में रहते हैं। वे शहर के बाजार में सब्ज़ियाँ बेचते हैं। कालूराम की चार लड़कियाँ भी हैं। एक की शादी हुई थी, लेकिन अब तलाक हो चुका है और वह अपनी बेटी के साथ कालूराम के परिवार में ही रहती है। कालूराम की पत्नी का देहांत हुए दस वर्ष हो चुके हैं। अपनी बेटियों का पालन-पोषण और शादी की ज़िम्मेदारी अब कालूराम के कंधों पर है। संसार के सारे दुखों को मानो भगवान ने कालूराम के आंगन में ही दे दिया हैं। जीवन-यापन के नाम पर कालूराम के पास पचास बकरियों का झुंड है, जिनके दूध और मांस का व्यापार कर वह अपनी जिम्मेदारियाँ बखूबी निभा रहा था।

एक दिन जब मुन्ना छत पर पतंग उड़ा रहा था, तब उसने देखा कि कालूराम ठेले पर अपनी तीन बकरियों को जूट के बोरे से ढॅककर ले जा रहा था। वह बहुत उदास दिख रहा था। मुन्ना के मस्तिष्क में यह बात बार-बार घूम रही थी और शाम को उसने बाबा पंडित को भी यह बात बताई। कुछ दिनों बाद कालूराम एक बार फिर दुकान में पधारते हैं। इस बार उनके हाथ में बाबा पंडित के लिए अंगूर का गुच्छा था। यह देखकर बाबा पंडित उसे डांटते हैं। कालूराम बाबा की इस डांट को गलत समझे, इसके पहले ही बाबा उसे पैसे देते हैं और अंगूर खरीदकर लाने को कहते हैं। कालूराम के हाथों में लाए गए इन खरीदे हुए अंगूरों को अब बाबा बड़े मन से खाते है।

पूरे कार्यक्रम को मुन्ना दुकान की पीछे वाली खिड़की से देख रहा था। कालूराम के जाने पर मुन्ना बाबा पंडित से पूछता है, “कालूराम आपको इतना प्यार क्यों करता हैं?” उत्तर में बाबा पंडित बताते हैं कि एक बार कालूराम को आंखों से धुंधला दिखाई दे रहा था, तब उनकी पत्नी जो सरकारी अस्पताल में डॉक्टर हैं, उन्होंने कालूराम के आंखों का मोतियाबिंद का ऑपरेशन करवाया था। तब से कालूराम इस पूरी दुनिया में बाबा पंडित को ही अपना हितकारी मानते हैं।

अब बरसात का मौसम आ चुका था। इस बार बरसात अपने साथ कालूराम की साढ़ेसाती भी लाई थी। हर दूसरे दिन कालूराम की दो- तीन बकरियाँ बीमार होकर मर रही थी।
कुछ लोगों का कहना था की बकरियों ने कुछ गलत खाया होगा, कुछ का कहना था कि किसी की बुरी नज़र लगी है और कुछ कह रहे थे कि पशुओं की जान का व्यापार करने वालों पर यह ईश्वर का कहर था। कारण जो भी हो, परिणाम कालूराम भुगत रहा था। बीतते दिनों के साथ कालूराम का हौसला भी टूट रहा था। उसे बस अपनी ज़िम्मेदारियाँ दिखाई दे रही थीं। अपना दुखड़ा सुनाने वह बाबा पंडित के पास पहुंचा और उन्हें पूरी कहानी से वाक़िफ़ कराया। बाबा पंडित को पूरा क़िस्सा समझ में आ गया और उन्होंने कालूराम को बताया कि यह संक्रमण की बीमारी है, जो बरसात के मौसम में पशुओं में फैलती है । बाबा पंडित ने कहीं अखबार में पढ़ा था कि ऐसे हादसों में सरकार गरीबों की मदद करती है। बाबा पंडित कालूराम की मदद करने को पूर्ण रुप से तैयार थे और कालूराम को अगले दिन फिर अपने पास बुलाया। बाबा पंडित गांव के प्रधान और बी०डी०ओ० को चिट्ठी लिखने का सोच रहे थे। अगले दिन कालूराम बाबा के पास फिर आता है। जब बाबा पंडित चिट्ठी लिख रहे थे, तभी मुन्ना चाय लेकर दुकान में आता है। मुन्ना बहुत उत्सुकता से बाबा पंडित से पूछता है, “पिताजी, आप किसे यह चिट्ठी लिख रहे हैं?” बाबा पंडित बताते हैं कि यह चिट्ठी वे सरकारी अफ़सर को लिख रहे थे। तभी पीछे से कालूराम बोल उठता है, “हमारा मुन्ना बड़का अफ़सर बनेगा।” फिर तो मुन्ना के होनहारी के क़िस्से शुरू हो जाते है। पूरे संवाद में मुन्ना को बड़का अफ़सर बनने वाली बात सबसे अच्छी लगती है। वह अब सबसे बोलता फिरता है कि मैं बड़का अफ़सर बनूंगा।

अगले दिन चिट्ठी लेकर कालूराम गाँव के प्रधान और बी०डी०ओ० के पास पहुंचता है और अपना किस्सा सुनाता है। तभी प्रधान पूछते हैं, “मुझे तो नहीं लगता कि तुम्हारे परिवार में या तुम्हें किसी को लिखना आता है, तो यह चिट्ठी तुम्हारे लिए किसने लिखी है?”

कालूराम के मुंह से तुरंत हीे बाबा पंडित का नाम निकल जाता है। भोला कालूराम यह नहीं जानता था कि सरकारी कामकाज और उनके कर्मचारियों की हालत इतनी ही अच्छी होती, तो आज देश का यह हाल न होता। मगर इन लोगों को आश्वासन देना भली-भांति आता है और कालूराम के साथ भी यही हुआ।

शाम हुई। गांव के प्रधान बाबा पंडित की दुकान पर पधारते हैं। बातों ही बातों में बाबा पंडित से बोलते हैं, “सुना है कालूराम की चिट्ठी आपने लिखी थी।” बाबा पंडित सर हिला कर हामी भरते हैं और पूछते है, “हाँ, उसका क्या हुआ? वह बड़ा गरीब है, सरकार को उसकी मदद करनी चाहिए।” प्रधान हँसते हुए कहता है, “हाँ, मदद तो होनी चाहिए। मगर इसमें आपका क्या फायदा है?”

बाबा पंडित को अब सब कुछ भली-भांति समझ में आ रहा था। स्वयं की छवि को कलंकित होने से बचाने के लिए बाबा पंडित ने ठान लिया कि अब वह इस मामले में संलग्न नहीं होंगे।

दिन बीतते गए। कालूराम अब तक कई बार प्रधान और बी०डी०ओ० के चक्कर लगा चुका था। किसी के बताने पर वह समाज कल्याण विभाग में पहुंचा। वहाँ कालूराम ने चपरासी, बाबू और ‌अन्य कई लोगों को सुविधा शुल्क के नाम पर रिश्वत देकर बड़ी मुश्किल से बड़े साहब से मिलने पहुंचा। बड़े साहब ने पूरा मामला सुनकर कालूराम से कहा, “मैं कैसे मान लूँ कि आपके बकरियों की मृत्यु बीमारी से हुई है? यह भी तो हो सकता है कि उन्हें आपने ही मारा हो। जाइए और जाकर पशुपालन विभाग से पशु चिकित्सा अधिकारी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट ले कर आइए तभी मैं आपकी कुछ मदद कर सकता हूँ।”

अगले ही दिन कालूराम जिला पशु चिकित्सा अधिकारी के पास पहुंचा। वहाँ उसे पता चला कि उसे पशुओं के मरने पर उन्हें दफ़्न करने के बजाए उनका पोस्टमार्टम करवाना चाहिए था। तभी सरकार उसकी कुछ मदद करती। अब जब उसे लगा कि ये लोग उसकी मदद नहीं कर सकते, तब कालूराम ने जिलाधिकारी का दरवाज़ा खटखटाने की सोची। कई बार तो उसे दरवाजे से ही लौटा दिया गया। फिर छह महीनों के बाद अनेक कर्मचारियों को सुविधा शुल्क देने पर वह अपनी बात जिलाधिकारी तक पहुंचा पाया। उसकी विनती थी कि उसे सरकार की तरफ से नुकसान की भरपाई नहीं चाहिए। उसे बस इतनी पूँजी की जरूरत है कि वह फिर से कुछ बकरियों के साथ अपना काम शुरू कर सके। मगर यहां भी उसे निराशा हाथ लगी। जिलाधिकारी ने मामले को एक बार फिर समाज कल्याण विभाग के पास भेज दिया। इस दौरान उसके परिवार की दशा बद से बदतर होती चली जा रही थी। पहले भी कालूराम की ज़िंदगी में कुछ कम दुख नहीं थे, परंतु वह हमेशा खुश रहता था। मगर अब हालात इतने खराब हो गए थे कि कालूराम भी अब हिम्मत तोड़ने लगा था। बाबा पंडित जैसे लोग अपना व्यापार संभालने और छवि बचाते हुए उसकी बस छोटी-मोटी मदद कर सकते थे, लेकिन उसका सहारा नहीं बन सकते थे।

इसी दौरान मुन्ना ने कक्षा दसवीं की परीक्षा में पूरे जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया। अख़बार वालों ने बाबाजी के घर आकर मुन्ना की तस्वीर ली और मुन्ना के कामयाब होने पर बधाइयाँ दी। अगले दिन अख़बार में बाबा पंडित, उनकी पत्नी और मुन्ना की तस्वीर निकली थी और लिखा था, “बड़का अफ़सर बनना चाहते हैं ऋषित द्विवेदी।” इधर एक बार फिर कालूराम समाज कल्याण विभाग के चक्कर काटना शुरू कर दिए। यहां तक की कालूराम अब सरकारी कर्मचारियों को भी उपस्थिति के मामले में पीछे छोड़ चुका था।उसे अगर इसकी तनख़्वाह मिलती, तो वहाँ के कर्मचारियों की दोगुनी तनख़्वाह कालूराम को मिलती। अब तो कर्मचारियों को भी कालूराम से सुविधा शुल्क मांगने में लज़्ज़ा महसूस होती थी। परेशान होकर एक बाबू ने उससे कहा, “आपकी फाइल लखनऊ कार्यालय में भेज दी गई है। काम होते ही आपको सूचित कर दिया जाएगा।”

चार महीने बीत गए, परंतु कोई सूचना नहीं आई। अब बेटियों की शादी कराना तो दूर, उनके लिए रिश्ता ढूंढना भी कालूराम के बस की बात नहीं थी।

कालूराम को मुन्ना के कामयाबी का पता चला, तो वह अगले ही दिन बाबा पंडित की दुकान पर उन्हें बधाई देने पहुंचता है। इस बार वह खाली हाथ आता है। बधाई देते हुए वह मुन्ना को कहता है, “बेटा, मैं आपके लिए कुछ नहीं ला पाया।” वह अपने आप को बहुत लज़्ज़ित महसूस करता है। दुखी होकर वह बाबा पंडित से कहता है, “क्या एक अनपढ़ गरीब को जीवन जीने का हक़ नहीं है? मुझे पता नहीं था कि बकरी के मरने पर उसको दफ़्न करने के बजाय उसका पोस्टमार्टम कराया जाता है। बाबा, आप ही बताइए कि इसमें मेरी क्या गलती है? जब योजना सरकार ने हमारे लिए बनाई है, तो हम तक बात पहुंचाना भी तो उनका ही काम होगा। आप जैसे बड़े लोगों को इन योजनाओं को बता कर क्या फायदा? आप जैसों को तो इनका भोग करते नहीं देखा और वह कुछ ही लोग होते हैं जो इन योजनाओं का भोग करते हैं, जबकि उन्हें इनकी ज़रूरत भी नहीं होती। बाबा अब मैं इन हालातों से हार चुका हूं।” यह कहते ही उसकी आंखों में आंसू आ गए। बाबा पंडित कालूराम के हाथ में कुछ पैसे रखते हुए बोले, “ऊपर वाले पर विश्वास रखो भाई। वह सब कुछ देख रहा है और लखनऊ से जल्द ही अच्छी ख़बर आएगी।” फिर कालूराम चला जाता है।

अगले दिन जब मुन्ना सो कर उठता है, तो देखता है कि सड़क पर बहुत भीड़ लगी है और बाबा पंडित भी दुकान बंद कर वही खड़े हैं। मुन्ना दौड़ते हुए वहाँ पहुंचता है और देखता है कि वहाँ कालूराम और उसकी सभी बेटियों का शव पड़ा है। बाबा पंडित एक कोने में खड़े रो रहे थे और उन्हें पछतावा इस बात का था कि काश! उन्होंने कल कालूराम को पैसे ना दिए होते, जिससे वह अपने पूरे परिवार के लिए ज़हर खरीद कर लाया था। वहाँ अनेक विभाग के कर्मचारी और अधिकारी भी पहुंचे थे। गाँव के प्रधान कह रहे थे, “कालूराम को अपनी दशा मुझे बतानी चाहिए थी। मैं उसकी मदद तो ज़रूर ही कर सकता था।” बी०डी०ओ० का भी यही कहना था। तहसीलदार का कहना था, “मुझे एक बार बात बताई होती, तो मैं मंत्री जी से कहकर कालूराम की मदद जरूर करवाता।” बड़के अफसर ने कहा, “इतना तो सरकार ने हमें हक़ दे ही रखा है कि ऐसे लोगों की हम मदद कर सके।”

मुन्ना वहाँ खड़ा होकर यह सब सुन रहा था और फिर बाबा पंडित के पास जाकर कहता है, “पिताजी, अगर बड़का अफसर बनने के लिए मेरे अंदर ये सारे गुण होने चाहिए, तो मैं क्षमा चाहूंगा। मैं बड़का अफसर नहीं बन सकता।”

बाबा पंडित मुन्ना को गले से लगाकर रोने लगते हैं। मुन्ना के मस्तिष्क में अभी यह बात ही चल रही थी कि यहाँ मैंने हर उस पद पर विराजित मनुष्य को देख लिया जो मैं बनना चाहता हूँ, मगर अब मुझे इनमें से कुछ भी बनने की इच्छा नहीं । “भविष्य में मैं क्या बनना चाहूंगा?”, यह मुन्ना के लिए फिर से एक अहम सवाल हो गया। बाबा पंडित फिर मुन्ना को गले लगाकर सोचते हैं,

“ज़िंदगी क्या है आज इसे ऐ दोस्त

सोच लें और उदास हो जाएँ।”

-वत्सल द्विवेदी (द्वितीय वर्ष)

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About Saket Bihari

बिहार के शिवहर जिले में बागमती नदी के किनारे एक गाँव आबाद है पहाड़पुर। वह गाँव जहाँ एक ब्राह्मण परिवार में मेरा जन्म हुआ। पला-बढा। नौवीं में था, जब हमारे नवोदय विद्यालय में हिन्दी क्लब बनाया गया। हिन्दी में शायद सबसे अच्छा और मशहूर था उस समय। क्लब का कैप्टन बना दिया गया। और शायद मेरे साहित्यिक जीवन की शुरुआत भी यही से मुझे मानना चाहिए। वैसे साहित्य में रुचि बचपन से ही रही है। चौथी-पाँचवीं में ही डायरी लिखना शुरु कर दिया था। वहाँ अपनी संवेदनाऍ अभिव्यक्त करता था। लेकिन हाँ, छुपकर लिखता था। डायरी मेरा सबसे अच्छा साथी था, जहाँ मैं अपने आप से भी छुपाए हुए राज़ आहिस्ता-आहिस्ता उतारकर उन्हें निहार सकता था। एक दिन चोरी से कुछ दोस्तों ने मेरी डायरी पढ ली। उसके बाद मैंने कभी डायरी न लिखने की क़सम खा ली। कई साल बाद फिर से डायरी लिखना शुरु किया। अपने विचारों को काग़ज़ पर उतारने की प्रतिभा वही से आई। घर मेंं भी बड़ा अच्छा साहित्यिक माहौल था। मेरे दादाजी श्री इंद्रदेव तिवारी 'द्विजदेव' एक सेवानिवृत्त शिक्षक, कवि, गीतकार, गायक और हारमोनियम वादक हैं। साहित्य के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए जिला और राज्य स्तर पर कई बार सम्मानित किए जा चुके हैं। मेरी बड़ी दीदी ओमी रानी भी सुन्दर कविताएँ लिखती हैं। इस प्रकार रचनात्मक लेखन के प्रति मेरा झुकाव एक स्वाभाविक घटना थी। एक कारण और भी है। बचपन से लेकर आज तक मेरी अंतर्मुखता ने कभी मेरा पीछा न छोड़ा। ऐसे में कलम की स्याही बड़ी मददगार साबित होती है। इ जो लिखने का रस्ता है न, बड़ा इंटेरेस्टिंग है। बोले तो एकदम क़यामत टाईप। फिलिम में जूही चावला अपनी सहेली सब के साथ जइसन रस्ता से पिकनिक मनाने जाती है न, एकदम ओएसा ही रस्ता है, डिट्टो। जब कभी भी बोर हो जाता हूँ, तो रचनात्मक लेखन का सहारा लेता हूँ। एक सपनों की दुनिया बनाता हूँ। एक ऐसी दुनिया, जिसमें मैं सिर्फ़ साकेत बिहारी होता हूँ। कोई नक़ाब नहीं। मेरे अपने किरदार होते हैं। मेरे हिसाब से घटनाएँ घटती हैं। उस फिल्म का निर्देशक भगवान नहीं, मैं होता हूँ। मैं ज़्यादातर अपने लेखन में अपने हृदय के निकट के विषयों को उठाता हूँ। मेरी रचनाएँ कहीं-न-कहीं अपनी आसपास की घटती घटनाओं के मन पर अंकित हस्ताक्षरों और कल्पना का समावेश है। अभी आई.आई.टी.(बी.एच.यू.) में रासायनिक अभियांत्रिकी की पढाई कर रहा हूँ। लिखने का यह सिलसिला अब तक जारी है और ताज़िंदगी रहेगा, ऐसा मेरा प्लेटिनिक-विश्वास कहता है।

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