गाँवों में, कस्बों में कुछ ऐसी गलियाँ होती हैं, जहाँ हमने अपना समूचा बचपन बिताया होता है। आज भी उदास पलों में धीरे-धीरे वहाँ गुज़रे हुए सारे पल सरसराती महकती हवा की तरह गुज़रते हैं और मन अचानक खुश हो जाता है। लेकिन वक्त की सुईयाँ पंख लगाये उड़ती हैं। हमारे पैरों के नीचे वाले सड़क और उन गलियों में एक लंबा फ़ासला आ जाता है और फिर एक लंबे अंतराल के बाद जब हमारे पैरों के नीचे चलती रहने वाली सड़क उन गलियों में जाकर रुकती है एक दिन, तो हम देखते हैं कि सब कुछ बदल गया है। अब उन लावारिस गलियों में बहुत कम लोग रहते हैं, दूसरी गलियों में जा चुके होते हैं। हम उस निर्जन स्थान पर जाकर खड़े होते हैं, जहाँ हमारे होने का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण हिस्सा आज भी मौज़ूद होता है। हम अपनी आँखें बंद करते हैं, वहाँ की महक को अपने फेंफड़े में भरते हैं, कुछ देर रुकते हैं और फिर बड़ी तेज़ी से वहाँ से लौट आते हैं।

कुछ ऐसी ही कहानी है मेरी और गोविंदा की। जी, वही फिल्मों वाला गोविंदा।

आज बहुत दिनों बाद परीक्षा के चंगुल से आजाद हुआ, यूट्यूब खोला। अभी थोड़ी देर पहले ही कमरे के अंधेरे में मेरे मोबाईल की स्क्रीन पर हल्की-हल्की रौशनी में गोविंदा अपनी नई फिल्म “रंगीला राजा” का ट्रेलर दिखा रहा था। दरअसल मैंने आज तक जिस अभिनेता की सबसे ज़्यादा फिल्में देखी है, वह है गोविंदा। गोविंदा मतलब मेरे बचपन की यादें। छठी से दसवीं तक नवोदय के हाॅस्टल में रहा। बाहर के दोस्तों की तुलना में बहुत कम फिल्में देखने को मिलती थी। लेकिन जब-जब मौका मिलता था, गोविंदा की फिल्में देखा करता था। पूरी शिद्दत, नीयत, मुहब्बत, तबीयत और कुछ कुरकुरों के साथ।

गोविंदा की फिल्में हमारे समाज की उत्सवधर्मिता का एक बेहद सटीक आईना है। समस्याएँ आती हैं, चली जाती हैं, लेकिन ज़र्रे-ज़र्रे के अंदर ज़िंदगी को जश्न की तरह मनाने को लेकर एक जीवट दिखाई देता है। उनकी फिल्मों में भी, हमारे आंचलिक जीवन में भी।

अब इतने साल गुज़र गये। ज़माना बदला है, सिनेमा बदला है, लोग बदले हैं। लेकिन गोविंदा शायद इस बदलाव को नज़रअंदाज करना चाहते हैं। मुझे यह कहते हुए बड़ा दु:ख हो रहा है कि पहली बार मुझे गोविंदा को देखकर मज़ा नहीं आया

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About Saket Bihari

बिहार के शिवहर जिले में बागमती नदी के किनारे एक गाँव आबाद है पहाड़पुर। वह गाँव जहाँ एक ब्राह्मण परिवार में मेरा जन्म हुआ। पला-बढा। नौवीं में था, जब हमारे नवोदय विद्यालय में हिन्दी क्लब बनाया गया। हिन्दी में शायद सबसे अच्छा और मशहूर था उस समय। क्लब का कैप्टन बना दिया गया। और शायद मेरे साहित्यिक जीवन की शुरुआत भी यही से मुझे मानना चाहिए। वैसे साहित्य में रुचि बचपन से ही रही है। चौथी-पाँचवीं में ही डायरी लिखना शुरु कर दिया था। वहाँ अपनी संवेदनाऍ अभिव्यक्त करता था। लेकिन हाँ, छुपकर लिखता था। डायरी मेरा सबसे अच्छा साथी था, जहाँ मैं अपने आप से भी छुपाए हुए राज़ आहिस्ता-आहिस्ता उतारकर उन्हें निहार सकता था। एक दिन चोरी से कुछ दोस्तों ने मेरी डायरी पढ ली। उसके बाद मैंने कभी डायरी न लिखने की क़सम खा ली। कई साल बाद फिर से डायरी लिखना शुरु किया। अपने विचारों को काग़ज़ पर उतारने की प्रतिभा वही से आई। घर मेंं भी बड़ा अच्छा साहित्यिक माहौल था। मेरे दादाजी श्री इंद्रदेव तिवारी 'द्विजदेव' एक सेवानिवृत्त शिक्षक, कवि, गीतकार, गायक और हारमोनियम वादक हैं। साहित्य के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए जिला और राज्य स्तर पर कई बार सम्मानित किए जा चुके हैं। मेरी बड़ी दीदी ओमी रानी भी सुन्दर कविताएँ लिखती हैं। इस प्रकार रचनात्मक लेखन के प्रति मेरा झुकाव एक स्वाभाविक घटना थी। एक कारण और भी है। बचपन से लेकर आज तक मेरी अंतर्मुखता ने कभी मेरा पीछा न छोड़ा। ऐसे में कलम की स्याही बड़ी मददगार साबित होती है। इ जो लिखने का रस्ता है न, बड़ा इंटेरेस्टिंग है। बोले तो एकदम क़यामत टाईप। फिलिम में जूही चावला अपनी सहेली सब के साथ जइसन रस्ता से पिकनिक मनाने जाती है न, एकदम ओएसा ही रस्ता है, डिट्टो। जब कभी भी बोर हो जाता हूँ, तो रचनात्मक लेखन का सहारा लेता हूँ। एक सपनों की दुनिया बनाता हूँ। एक ऐसी दुनिया, जिसमें मैं सिर्फ़ साकेत बिहारी होता हूँ। कोई नक़ाब नहीं। मेरे अपने किरदार होते हैं। मेरे हिसाब से घटनाएँ घटती हैं। उस फिल्म का निर्देशक भगवान नहीं, मैं होता हूँ। मैं ज़्यादातर अपने लेखन में अपने हृदय के निकट के विषयों को उठाता हूँ। मेरी रचनाएँ कहीं-न-कहीं अपनी आसपास की घटती घटनाओं के मन पर अंकित हस्ताक्षरों और कल्पना का समावेश है। अभी आई.आई.टी.(बी.एच.यू.) में रासायनिक अभियांत्रिकी की पढाई कर रहा हूँ। लिखने का यह सिलसिला अब तक जारी है और ताज़िंदगी रहेगा, ऐसा मेरा प्लेटिनिक-विश्वास कहता है।

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