मेरे सामने हज़ारों-हज़ार की भीड़ सभागार में खचाखच भरी हुई है। गूँजते शोरों और पसरे हुए अँधेरों से अलग मैं मंच पर आज गायकी का एक सितारा बन गया हूँ। मेरे सारे ख़्वाब कामिल हो गए हैं। मैं धीरे से आँखें बंद करता हूँ, और मुझे वो ख़ास दिन याद आ जाता है जब इस दिन तक पहुँचने का सिलसिला शुरू हुआ था…

हमसफ़र बन के हम साथ हैं आज भी,
फिर भी है ये सफर अजनबी-अजनबी…

उस शाम में गायक ये ग़ज़ल गा रहा था। मुझे साफ़-साफ़ याद है ग़ज़ल का वह कॉन्सर्ट जब पहली बार तुम्हें देखा था। माफ़ करना पर तुम्हें देखकर मैं बहुत सी पूर्व-धारणाओं से भर गया था। तुम्हारे हाई-हिल्स वाली सैंडल जिसकी हील कठफोड़वे के चोंच जैसी नुकीली-पैनी लग रही थी, शोलों की तरह सुर्ख़ लाल रंग की वन-पीस और घने रात से खुले काले बाल। मुझे लगा कि तुम हनी सिंह और बादशाह के रैप को सुनकर डिस्को में थिरकने वाली कोई ‘मॉडर्न’ लड़की होगी। पर ग़ज़ल के उस शाम में तुम्हें पुराने गीतों पर सिर झुमाते देखकर ऐसा लगा कि मरुस्थल में मरुद्यान देख आया हूँ। कोई भी यही सोच रहा था कि- कौवों की ज़मात में हंस कैसे? सुन तो मैं उस गायक को ज़रूर रहा था जो जगजीत सिंह को गजलों को गा रहा था पर उसकी अल्फ़ाज़ का हर ‘तुम’, ‘कोई’ और ‘वो’ तुम्हें देखकर ही मन में एक तस्वीर पाती थी। रास्ते में अपने दोस्त विकास से पता चला कि तुम तो उसकी दीदी की अच्छी दोस्त हो और कभी-कभार घर पर डिज़ाइनिंग सीखने आती हो। फिर क्या था? फेसबुक और इंस्टाग्राम चलाने के 3 साल का अनुभव और ‘स्टाकिंग’ में जासूस होने की दक्षता हासिल करने वाले के लिए तुम्हारा प्रोफाइल ढूँढना मुश्किल बात नहीं थी। फ्रेंड रिक्वेस्ट का भेजना, एक्सेप्ट होने का इंतज़ार और फिर वह पहला हाय। वो सिलसिला शुरू हो गया जिसे लोग मोहब्बत कहते हैं। फिर से वो खेल शुरू हो गया जिसे सारी दुनिया खेलने से तो मना करती है और ना खेलो तो मन नहीं मानता।

अपनी हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको,
मैं हूँ तेरा तो नसीब अपना बना ले मुझको।

शुरू में तो मुझे लगा कि अपनी बन नहीं पाएगी। पर धीरे-धीरे लगने लगा कि तुम मेरी डायरी का इंसानी रूप हो, जिसे लोग ह्यूमन डायरी कहते हैं। ज़िंदगी, दोस्त, घर-परिवार की बातें। किताबें, कविताएँ और ग़ज़लों की बातें।खासकर गुलाज़र के द्वारा लिखे नज़्म और जगजीत सिंह के गाये ग़ज़ल। मानों छोटी-छोटी चीज़ें जिनका ऐसे तो कोई ख़ास वज़ूद नहीं था, हमारी बातचीत के लिए अपने विभिन्न आयामों को खोल चुका हो और हमलोग विश्लेषक की तरह बातें करते। और फिर बातें ज़ल्द ही मुलाकातों में भी बदल गयी। अब सोचता हूँ तो लगता है की सब स्क्रिप्टेड था- पहले से लिखा हुआ और हमलोग बस अपने किरदार अच्छे से निभा रहे थे। पर उस समय; उस समय तो ऐसा लगता था कि जैसे ज़िंदगी रोज़ नई-नई संभावनाओं से भरा हो, नए सरप्राइज दिखाने के लिए ही सूरज की धूप मेरी आँखों को टटोलती हो। मुझे याद है कितना ज़ल्दी बस से शहर का सफ़र करने का मेरा प्रस्ताव मान गयी थी। ठहरना तुम्हें अच्छा ही नहीं लगता था। ये आदत अबतक है तुममे। खिड़की वाली सीट पर बैठने के लिए सात आसमान सिर पर उठा लिया था तुमने। ग़लती किसी की हो गलती मेरी ही होती थी। पर वो सफ़र। आह! काश वो कभी ना रुकता। एक ही इयरफोन से गाना सुनना, तुम्हारी खाई हुई आधी बिस्कुट को झपटकर मेरा खा जाना, तुम्हारा मुझे खिड़की के बाहर अजीबो-गरीब चीज़ो को दिखाना और फिर हँसना। उस हँसी का स्मरण-मात्र भी मुझे आज ज़िंदगी की परेशानियों में गुनगुने पानी से थके पैरों के धुलने का अनुभव होता है। तुमने खिड़की के बाहर सिर निकाल लिया है और तुम्हारे बड़े लहराते बाल मेरे होठों से चिपक गए हैं। मानों मेरे बोलने की आज़ादी जबरन छीन ली गयी हो। पर ये मेरी आँखों का जलसा था। बस के अचानक से ब्रेक ने इस खूबसूरत सिलसिले पर भी ब्रेक लगा दिया। हम उतरे और किले, खंडहर, अजायबघर और मंदिरों में घूमे। कभी प्रेमी, कभी योगी, कभी सन्यासी तो कभी इतिहासकार बन कर। अंत में थककर मैंने बैठने को कहा। एक खाली बेंच पर हमलोग बैठे और तुम मुझे अपने सबसे पसंदीदा ग़ज़ल गाने को कहती हो। और फिर मैंने गाया-

बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं,
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं, बहुत पह…

मैं बढ़ ही रहा था कि तुमने रोका और कहा कि मैं गंदा गाता हूँ। नहीं अब मत गाओ। मैं जैसा भी गा रहा था पर अपना बचाव करते-करते लड़ने लगा तुमसे और फ़िर मेरा सिर तुम्हारी गोद में आ गिरा। वहाँ से तुम्हारे चेहरे तक की दूरी अनंत जैसी लग रही थी। प्रेम सचमुच ऊँचा होता है। पल भर लेटे-लेटे हमारी आँखों के मिलनेे से कुछ ऐसा लगा कि जैसी सदियों से मैं ऐसी ही तुम्हारी गोद में पड़ा हूँ। पर तुम असहज हुई और लौटने को कहने लगी। लौटते सफ़र में तुम बहुत कम बोली। जैसे ही हम अपने गन्तव्य पर पहुँचे तुम्हारी नींद मेरे कंधे के तकिए से टूटी। घर जाते ही मुझे एक मैसेज आया- थैंक्स! मैंने अपने उमंग को रोकते हुए प्रतिउत्तर दिया-फ़ॉर व्हाट?
उधर से ज़वाब था- फ़ॉर एवरीथिंग। फ़ॉर कमिंग इंटु माई लाइफ।

प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है,
नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है।

वक़्त लगा भी, वक़्त नहीं भी लगा। हम अपने वज़ूद को एक-दूसरे के हवाले कर चुके थे। अपनी ज़िंदगी, अपने ख़्वाब सब कुछ साझा किये हमने। मैंने बताया कि मैं कैसे दुनिया में कुछ बड़ा हासिल करना चाहता हूँ, सबके दिलों में बसना चाहता हूँ। और जब मैं सफलता के उस मुक़ाम पर रहूँ तो तुम मेरे साथ रहो, बस यही मेरी दुआ है। तुम ये सुनकर मेरी बाजुओं में बिखर जाती हो, मुझे अच्छा लगता है। तुम इतनी महत्वाकांक्षी तो नहीं थी, परन्तु माँ-पापा को अपनी वज़ह से बहुत खुश होना ज़रूर देखना चाहती थी।

लेकिन वक़्त की आदत भी आदमी जैसी होती है, पल भर भी नहीं ठहरता। तुम्हारे पापा एक सरकारी अधिकारी थे और उनका तबादला बहुत दूर हो गया और उस समय हमने एक नया टर्म जाना- ‘लॉन्ग डिस्टेंट रिलेशनशिप’, लम्बी दूरी का रिश्ता। जिसने ये कहा था कि 3 कोस पर पानी बदले, 4 कोस पर वाणी;उसे ये भी साफ़ देना चाहिए था कि कितने कोस के बाद रिश्तें भी बदल जाते हैं। बहुत दिनों से हमारी बात अच्छे से हो नहीं पाई थी। हमारी दिनचर्या ने भी हमारा साथ नहीं दिया। तुम तब ही खाली होती थी जब मेरे कुछ काम होते थे। और मैं जब खाली होता तो तुम व्यस्त रहती। ये लम्बी दूरी को तय करते-करते प्यार थक रहा था, कड़ी परीक्षाएँ ले रहा था। एक शाम मौका मिला और हमलोग फ़ोन पर बातें करने लगे। तुम गुमसुम थी और मैं इग्नोर फील कर रहा था। मैंने ताने मारने के अंदाज़ में कह दिया कि लगता है कोई और खास हो गया है। और अचानक से तुम भड़क गयी। और पूरे विश्वास के साथ मुझपर अविश्वास जताते हुए तुमने कहा,-“मुझे नहीं लगता ये रिश्ता कहीं जाएगा, मुझसे नहीं होगा।” “क्या?”मैंने काँपते होठों से एक लाज़िम सवाल पूछा। उसने कहा-“छोड़ दो मुझे। हमारा कोई फ्यूचर नहीं दिख रहा मुझे।”
“हमलोग फिगर आउट कर लेंगे”,मैंने याचना भरे स्वर में कहा।”
“हम अपना करियर चौपट कर रहे हैं, तुम्हें बहुत कुछ हासिल करना है।”
“पर शर्त तो येे थी कि तुम साथ रहो उन कामयाबियों के वक़्त। तुम्हारे बिना क्या करूँगा मैं करियर का?”, मैंने इस एक नेचुरल सवाल किया।
और तुमने कहा- ” प्लीज़ एंड सॉरी, डॉन्ट कॉल मी एवर।”

ये सच था कि हमारे बीच इधर कुछ दिनों से बहुत अच्छा नहीं चल रहा था। फोन पर एक दूसरे से ढंग से बात नहीं हो पा रही थी। मुझे बुरा भी लगता था कि तुम मुझे ना वक़्त देकर अपने नए दोस्तों से ज़्यादा क़रीब हो रही थी। पर एक दूसरे से अलग होने का ख़्याल मुझे कभी नहीं आया। मैं हमेशा ये मानकर चलता था चाहे हालात कितने ही प्रतिकूल क्यों ना हो जाएँ, हम साथ रहेंगे। ब्रेक-अप के ख़्याल से ही मैं रुआंसा हो गया। मैंने बहुत मान-मन्नत की, अपने को बदलने का वायदा किया, तुम बिन ना जी पाने कि अपने बुरे ख्वाबों को बताया, पर मेरे सारे पैंतरे बेअसर ही रहे। तुमने मिलने तक को मना कर दिया और…तुम चली गयी।

सदमा तो है मुझे भी के तुझसे जुदा हूँ मैं,
लेकिन ये सोचता हूँ के अब तेरा क्या हूँ मैं।

मैं बहुत दिनों तक सदमें में रहा। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि क्या जुदा होकर हमलोग कभी साँसें भी लेंगे। क्या कभी अल्वग नहीं होने वाले पंछियों का रास्ता भी बदल सकता है? कितना आसान था तुम्हारे लिए कह देना कि भूल जाओ मुझे। ज़िंदगी की खुशियाँ बस नक़ाब हैं, भरम है। और जब उसके पीछे का नँगा सच दिखता है कि सबकुछ नश्वर, सबकुछ ड्रामा लगने लगता है। वादें, कसमें, हमेशा के रिश्ते; मन को बहलाने के हमारे बनाये यंत्र हैं। तुम्हें सोच-सोचकर मैंने अपनी हालत देवदासों जैसी कर ली। तुम्हें मन से हटाने के लिए हर सोशल मीडिया को डिलीट कर दिया। तुम्हारे ख़त, तोहफ़ें, यादें सब जला डाले। पर सदमा ख़त्म नहीं हुआ। पर जब हमें लगता है कि ज़िंदगी अब कहीं बढ़ नहीं पाएगी, कोई ना कोई रास्ता मिल जाता है और बेपरवाह उस पर चल के हम अपनी नियति लिख डालते हैं।
दिन महीनों में बदले और महीने सालों में। मुझे एक स्टूडियो में एक गायक के तौर पर काम मिल गया। कुछ नए दोस्त बना लिया और तुम्हें सोचने से बचने के लिए अपने काम पर ध्यान देने लगा। जगजीत सिंह की ग़ज़लों ने मेरा साथ कभी नहीं छोड़ा, तुमसे विपरीत। मैं उनके गीतों को गाकर लोगो के ज़हन में उन्हें हमेशा के लिए अमर में देना चाहता हूँ क्योंकि उसमें ज़िंदगी की सच्चाई और चैन है-मेरे हालात भी। धीरे-धीरे मैं इस काम के लिए प्रसिद्ध हो जाता हूँ और और कामयाबी हासिल करता हूँ।

पाँच साल बाद आज उसी ओडिटोरियम में जहाँ पहली बार ग़ज़ल के कॉन्सर्ट में हम साथ थे, मैं हूँ-उस मंच पर उभरता गायक बन कर। सभी मेरे गाने के सुनने के लिए बेताब हैं। दर्शकों में बैठे चेहरे मुझे दिखते नहीं। पर न जाने कितने वैसे दो लोग होंगें जैसे हम थे। मैं बीते लम्हों को यादकर के भावुक भी हूँ। मैंने इस दिन चाहा था तुम्हें मेरी बगल में। मैं बगले देखता हूँ और वहाँ तुम्हारी आत्मा, परछाई या साया जैसा कुछ दिखता है। पर न जाने क्यों सहसा तुम्हारा एहसास ज़्यादा होने लगा। जैसे हम दोनों के मौजूदगी के बिना इस सभागार में कोई कॉन्सर्ट कभी हो ही नहीं सकता। साँसों में एक अजीब सी खुशबू आती है और उन्हें और महसूस करने के लिए मेरी साँसें और बेचैन हो जाती हैं। हॉल की आवाज़ें अचानक से शांत हो जाती हैं और मेन गेट से आ रही रौशनी को बीचोबीच से रोकते हुए कोई खड़ा दिखता है। उसके चलते ही सैंडिल की आवाज़ से पूरा हॉल प्रतिध्वनियों से गूँजने लगता है-कोई चिरपरिचित सी ध्वनि। हॉल का स्पॉट लाइट जब उधर की ओर जाता है तो देखता हूँ कि ये तो… तुम हो। तुम, जिसका इंतज़ार मैंने ना चाहते हुए हर साँस में किया। तुम, मेरा सबकुछ। तुम, जिसकी आहट सदा धड़कन बनके मेरे दिल में रही। मैं तुम्हारी ओर देखता रहता हूँ और बरबस मेरे मुँह से मेरी सबसे पसन्दीदा ग़ज़ल निकल पड़ती है-

बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं,
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं।

तबियत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में
हम ऐसे में तेरी यादों के चादर तान लेते हैं।

फ़िराक’ अक्सर बदल कर भेस मिलता है कोई काफ़िर
कभी हम जान लेते हैं कभी पहचान लेते हैं।

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About Aman Sharma

कबसे से खुद को जानने की कोशिश कर रहा हूँ, कोई बतला दे मुझे ये मोहब्बत इस जहाँ में नहीं तो किस जहाँ में है, कोई दिला दे मुझे । किसी दिन फुर्सत में होंगें तो लिखेंगे खुद के बारे में फ़िलहाल की ख़ातिर हमारे लफ़्ज़ काफ़ी हैं । कवि, लेखक या शायद कुछ भी नहीं ।

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