पूरा बचपन प्यार-मोहब्बत की पिक्चर देखने में निकल गया। जब बड़े होकर अपने दोस्तों को प्यार के समंदर में गोते लगाते देखा, तो दिल ने दिमाग़ को इश्क़ के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। एक दिन जब उस तिलिस्मी इश्क़ को जानने को मन बेसब्र हो गया, तो निकल पड़ी मैं प्यार की खोज में।
बारिश भी हो रही थी उस दिन। कहते हैं कि बारिश प्यार करने वालों को मिलाती है। ऐसा लग रहा था कि खुद इंद्र देव भी मुझ पर कृपा बरसा रहे थे। जैसे ही घर की चारदीवारी से निकली, आगे बढ़ने से पहले कदम रुक गए। सामने दो लोग साथ मिलकर बारिश में भुट्टा खा रहे थे। ऐसे ही प्यार को तो देखा था मैंने सिनेमा में। फिर वही सवाल दिमाग़ को झंझोड़ने लगा कि इस प्यार की परिभाषा क्या है? थोड़ा और आगे जाने पर फिर दो हंसो का जोड़ा दिख गया। अब तो मेरी इच्छा और प्रबल हो गयी, ये जानने को कि प्यार है क्या? मेरी जिज्ञासा की गर्जना मेघ करने लगे और बारिश तेज हो गई। तेज हवा चलने लगी। ना चाहते हुए भी एक टपरे के नीचे जा खड़ी हुई।अब क्रोध आ रहा था ईश्वर पर कि क्या वे चाहते ही नही हैं कि मैं ये जानूं? तभी वहाँ एक बच्ची आती है अपने माता-पिता के साथ, किन्तु ज़गह सिर्फ़ एक की थी। बिना कुछ सोचे माँ अपनी बेटी को वहाँ खड़ी कर खुद बारिश में भीगती रहती हैं। मैं इस सोच में डूबी ही हुई थी कि मेरे मोबाइल की घंटी बजती है। मैंने फ़ोन उठाया, तो एक डरी हुई सी आवाज आई।

“कहाँ है तू?” मेरी माँ थी।

मैंने कहा, “बाहर हूँ।”

आवाज़ ऐसी आ रही थी मानो कोई वज्र गिरी हो।उन्होंने कहा, “जल्दी आ, दिल बैठा जा रहा है।” “ठीक है।” यह कह कर मैंने फ़ोन रख दिया।

ऐसा लगा मानो मैंने वो खोज कर ली हो, जिसके लिए मैं घर से निकली थी। यही तो शायद प्यार है। जब हम अपने बारे में ना सोचकर दिन-रात किसी और के बारे में सोचने लगे, उसे अपनी ज़िंदगी मान ले, उसे खुश देखकर मन खुश हो जाए। यही तो प्यार है जब बिना किसी कारण के मन खुश हो जाए। बिलकुल वैसे ही जैसे हमें पहली बार देखकर माँ खुश हुई होगी। आख़िर मैंने भी खोज कर ही ली प्यार की।

-अवनी मालवीया (प्रथम वर्ष)

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