गंगा की धूमिल धारा में,
तपते से मरू सहारा में,
जेठों में पड़ी दरारों में,
बेमौसम के सैलाबों में,
तुमको घुटते देख रहा हूँ,
मैं भारत हूँ खेद रहा हूँ।
ना राम मिले ना मिली ही माया,
क्या सोचा था औ क्या पाया।

मुन्ना के पंजर दिखते हैं,
अम्मा के नैना रिसते हैं,
जीवन सर्वत्र सुधारा जाय,
शिश्न कहाँ पर डाला जाय,
ये निर्णय होते देख रहा हूँ,
मैं भारत हूँ खेद रहा हूँ।
कौवे की कंचन है काया,
क्या सोचा था औ क्या पाया।

नारायण भट्ट, प्रथम वर्ष, बायोमेडिकल इंजीनियरिंग, आई.आई.टी. (का.हि.वि.), वाराणसी

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