न जाने ये सोच,
इतना क्यों घबराती है?
कभी भी सही वक़्त पर,
बाहर ही नहीं आती है ।

अनजानों के सामने तो,
सहम-सी जाती है।
पर कभी-कभी तो,
अपनों से भी लजाती है।

बाद में उन पलों को,
याद करके पछताती है।
कुछ न कर पाने का,
अफ़सोस जताती है।

मानती हूँ कि तुझे अपनों पर,
तरस आ जाता है।
मगर दूसरों के सामने,
क्यों कँपकँपाती है ?

आख़िर अपने आप को,
क्यों झूठलाती है?
तू ही तो दुनिया से हमारी,
पहचान करवाती है।

बहुत हुआ ये कि तू,
स्वयं से हार जाती है।
ऐ सोच! उठ प्रहार कर।
दुनिया तो यूँ ही बातें।

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