बुखार था वीज्ञान का, इंजीनरिंग सिखने लगे,
ले सॉफ्टी पी. सी. व एम कि, साहित्य छिकने लगे।

मशीन अब भरम, अभिराम शब्द में मिलने लगे,
न सी न जावा, कोड भि तुकबंद हम लिखने लगे।

न फ़ारमूला, अब ज़ेहन में शायरी टिकने लगे,
गणित कहाँ, हम मेहबूबजान को लिखने लगे।

शिखर जभी हिलने लगे, कली जभी खिलने लगे,
घटा जभी चिखने लगे, ग़ज़ल तभी जितने लगे।

अक्षर बने लफ्ज़, लफ्ज़ अल्फ़ाज़ में सिकने लगे,
कभी बहर में, उपन्यास भी कभी लिखने लगे।

इंजीनरिंग को छोड़कर कहानियाँ लिखने लगे,
कतार कर दरकिनार, किरदार में दिखने लगे।

– तनय केडिया

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About Tanay Kedia

मैं शायर तो नहीं, but your curvy brows infused poesy.

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