कुछ साल पहले एक फ़िल्म आयी थी—डेढ़ इश्किया। वैसे बॉक्स आफिस पर फ़िल्म तो कुछ खास नहीं कर पायी, पर इस फिल्म में कुछ सीन्स ऐसे थे जो रूह को छू गये। वो दिलकश दृश्य ज़हन में आज भी तरो-ताजा हैं। गुस्ताख़ी माफ़ हो, पर मैं कोई बोल्ड सीन का ज़िक्र नहीं कर रहा जो आजकल के युवाओं को ज़्यादातर लुभाते हैं। दरअसल फ़िल्म में एक मुशायरे का आयोजन किया जाता है जहां जान मोहम्मद का किरदार निभा रहे विजय राज, बड़े ही ख़ूबसूरत लबो-लहज़े में कुछ अशआर पढ़ते हैं—

वही ताज है, वही तख़्त है, वही ज़हर है, वही जाम है।
ये वही ख़ुदा की ज़मीन है, ये वही बुतों का निज़ाम है।

बड़े शौक़ से मिरा घर जला कोई आँच तुझ पे न आएगी,
ये ज़बाँ किसी ने ख़रीद ली ये क़लम किसी का ग़ुलाम है।

बेशक इन दोनों अशआर में मौजूं कमाल का है पर विजय राज ने जिस उस्लूब से इन्हें तहत में पढ़ा, मैं इन अशआर का कायल हो गया। मुझपर इन लफ्जों का जादू ऐसा हुआ था कि कई दिनों तक ये अशआर मेरी जुबां पर रहे। मैं इसे उस फ़िल्म की स्क्रिप्ट के तौर पर लिखी शायरी समझकर इसे दोहराता रहा, दोस्तों के सामने इसकी मिसाल देता रहा। फिर एक दिन इंटरनेट की जानिब से मुझे पता चला कि ये अशआर एक बड़े शायर की देन है, जिनका नाम है डॉ बशीर बद्र. थोड़ी छानबीन की तो पता चला कि उसी फिल्म में विजय राज ने भरी दावत में साकी के जो सामने शेर पढ़ा था—

यहाँ लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं।
मुझे गिलास बड़ा दे शराब कम कर दे।

वो भी बशीर बद्र साहब का ही है।यह सब जानकर थोड़ा मलाल भी हुआ कि आवाम के इतने बड़े शायर से मैं अब तक अनजान रहा। इस बात को अभी कुछ ही दिन हुए थे कि कालेज के शिक्षक दिवस की शाम हमारे एक बुजुर्ग प्राफेसर ने बशीर बद्र साहब के ग़ज़ल के दो शेर तरन्नुम में पढ़े। वो शेर थे—

यूँ ही बे-सबब न फिरा करो, कोई शाम घर में रहा करो।
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके -चुपके पढ़ा करो।

कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से।
ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।

मैंने बशीर बद्र साहब को पहली बार फ़िल्म में सुना, दूसरी बार शिक्षक दिवस के दिन प्राफेसर ने सुनाया, और तीसरी बार तक मैं बद्र-ऐडिक्ट  बन चुका था।

ये फख्र शायद ही किसी और शायर को हासिल हुआ होगा कि जब 60 के दशक में बशीर बद्र अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के तालीम-ए-इल्म थे, तो उनके ग़ज़ल खुद वहां के निसाब में शामिल थे। जब वो मेरठ में रहते थे तो दंगों में उनका घर लूट लिया गया था और जला दिया गया था। इस हादसे ने उन्हें झकझोर कर रख दिया और फिर वो एकांत की जिंदगी जीने लगे, कई सालों तक मुशायरों से दूर रहे। अपने इस दर्द को इस मशहूर शेर में बयां किया—

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में ।
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में ?

उनका ये शेर संसद में भी पढ़ा जा चुका है। उन्होंने खुद एक मुशायरे में इसका ज़िक्र किया और कहा कि उनका घर दो बार राख करके उनके हाथों में दे दिया गया। अभी हाल ही में कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने भाजपा को नफ़रत की राजनीति से सावधान करते हुए, संसद में बशीर बद्र एक शेर पढ़ा था—

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।

विभाजन के समय लिखा गया बशीर बद्र साहब का ये शेर सियासती इतिहास में काफ़ी अजीज रहा। यही शेर जुल्फिकार अली भुट्टो ने इंदिरा गांधी से शिमला समझौते पर दस्तख़त करते समय भी कहा था। अगले ही दिन खड़गे के जवाब में, और कांग्रेस को देश विभाजन, राजवंशी सियासत और देश के तमाम बदहालियों के लिए कूसूरवार ठहराते हुए, नरेंद्र मोदी ने भी बशीर बद्र साहब का ही एक शेर कहा—

जी बहुत चाहता है सच बोलें,
क्या करें हौसला नही होता !

कुछ ही दिनों बाद, बशीर बद्र साहब के फेसबुक पेज पर इस वाकये के ज़िक्र के साथ उनका ही एक शेर प्रकाशित हुआ—

सच अदालत से सियासत तक बहुत मसरूफ़ है,
झूट बोलो, झूट में अब भी मुहब्बत है बहुत।

बशीर बद्र साहब का ये मशहूर शेर भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को इतना पसंद आया कि उन्होंने इसे अपने डेस्क पर लिखवा रखा था—

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।

उस ज़माने में बशीर बद्र साहब का ये शेर आम लोगों से लेकर मीना कुमारी और दिलीप कुमार जैसी बड़ी हस्तियों के जुबान पर रहा। मीना कुमारी ने अपने इस पसंदीदा शेर को अपने हाथों से लिखकर ‘स्टार एंड स्टाइल’ मैगजीन में छपवाया था। दिलीप कुमार अपने दस्तख़त में अपने नाम से पहले ‘उजाले’ लिखा करते थे। भूतपूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह भी इस शेर के दीवाने थे और अक्सर अपने भाषण में ये शेर कहते थे। कहा जाता है, कि ये शेर उन्होंने अपनी मौत के कगार पर भी पढ़ा था।

आल इंडिया ऊर्दू सम्पादक सम्मेलन को अंज़ाम देते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने कहा था—

वो इत्र-दान सा लहजा मिरे बुज़ुर्गों का,
रची-बसी हुई उर्दू ज़बान की ख़ुश्बू।

उर्दू ज़बां के खूबसूरती पर लिखा गया ये शेर ‘डेढ़ इश्किया’ फिल्म में उसी मुशायरा के आगाज में अनवर जलालपुरी ने निजामत फरमाते हुए पढ़ा था।

1994 में मिस यूनिवर्स का ख़िताब जीतने वाली पहली भारतीय महिला सुष्मिता सेन ने टीवी पर एक इंटरव्यू में ये शेर पढ़ा था—

कोई हाथ भी ना मि‍लाएगा, जो गले मि‍लोगे तपाक से,
ये नए मि‍ज़ाज़ का शहर है, ज़रा फा़सले से मि‍ला करो।

सिनेमा से लेकर संसद तक, निजी जिंदगी के मसलें हो या सियासती सरगर्मियां, आम से लेकर खास लोगों ने बशीर बद्र की शायरी का सहारा लिया। सभी के अजीज रहे और लाखों दिलों पर राज किया। अपनी सादगी और सच्चाई की बदौलत हमेशा आवाम के महबूब शायर रहे। उनकी शोहरत, लोगों में उनके लिए मुहब्बत हमेशा बढ़ती ही गई और एक लंबे अरसे तक छाये रहे। रात-दिन लोगों के होते हैं, शायरों का ज़माना होता है।
भोपाल के ईदगाह हिल्स में बशीर बद्र साहब का तीन मंजिला आशियाना है। लिविंग रूम में पद्म श्री, साहित्य अकादमी पुरस्कार के साथ ही एक फोटो फ्रेम है। तस्वीर में बशीर बद्र साहब अटल बिहारी वाजपेई के पैर छूते हुए नजर आते हैं। इसके बारे में वो खुद बताते हैं कि ये तस्वीर न्यूयॉर्क में हुए एक बड़े मुशायरे कवि सम्मेलन की है। उस मुशायरे में अटल बिहारी वाजपेई जी को अंत में पढ़ना था। दरअसल मुशायरों और कवि सम्मेलन की एक रिवायत है कि बड़े शायर सबसे बाद में पढ़ते हैं। उस मुशायरे में अटल बिहारी वाजपेई ने लिस्ट से अपना नाम काट कर, बशीर बद्र साहब से अंत में पढ़ने को कहा। देश के प्रधानमंत्री ने अपना नाम काट कर जिसका का नाम लिखा हो, उसके लिए इससे बड़ी सम्मान की बात क्या हो सकती है? बशीर बद्र जब भाजपा से जुड़े तो देश भर के मुस्लिमों ने उनकी कड़ी आलोचना की थी। पर उन्हें यही सोचकर माफ़ कर दिया गया कि—

कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी,
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता।

फ्रेम के अंदर की तस्वीर को ज़हन में रहते हुए यही लगता है कि वो अपने ही एक शेर पर अमल नहीं कर पाए—

बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना,
जहां दरिया समन्दर में मिले, दरिया नहीं रहता।

मैंने बशीर बद्र साहब के ग़ज़ल रेख्ता की साइट से पढ़ना शुरू किया। फिर ये पाया देखा कि उनके पास हर हाल के लिए कोई ना कोई शेर है। हर शेर में लफ्जों की जादूगरी लगी। उनके अशआर मेरे दिल से होकर ज़हन में घर करते गए। मुझे जब कभी मंच मिलता तो शुरुआत बशीर बद्र के अशआर से करता हूँ—

इबादतों की तरह मैं ये काम करता हूँ,
मेरा उसूल है, पहले सलाम करता हूँ।

वैसे तो कभी ऐसी नौबत नही आई, पर ब्रेक-अप के लिए हमेशा खुद से ये शेर कहा—

अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आएगा, कोई जाएगा।
तुम्हें जिस ने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो।

हॉस्टल के छोटे से कमरे में पार्टी करते वक्तवक़्त बशीर बद्र साहब का शेर पढ़ना भी याद है—

ज़िन्दगी तूने मुझे कब्र से कम दी है ज़मीं,
पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है।

एक अज़ीज दोस्त जब लाख कोशिशों करके भी अपनी क्रश से फ्रेंडज़ोन हो गया था तो मैंने उसके हाल पर बशीर बद्र की एक ग़ज़ल के कुछ अशआर सुनाए थे जो उसका दर्द तो नहीं कम कर पाए पर उसे बेहद पसंद आए।

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला,
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला।

बहुत अजीब है ये क़ुरबतों की दूरी भी,
वो मेरे साथ रहा और मुझे कभी न मिला।

ख़ुदा की इतनी बड़ी क़ायनात में मैंने,
बस एक शख़्स को माँगा मुझे वही ना मिला।

मैंने बशीर बद्र साहब के शेर सिर्फ सुने या पढ़ें नही है बल्कि उन्हें जिया भी है। महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर के बाद अगर किसी शख्स ने मुझे प्रभावित किया है तो वो बशीर बद्र साहब हैं।

महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनें,
जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा।

कुछ दिन पहले फेसबुक पर एक वीडियो देखी। वीडियो में बशीर बद्र साहब बीमार नज़र आते हैं। पता चला कि फिलहाल बशीर बद्र साहब डिमेंशिया से जूझ रहे हैं। उम्र के साथ कमज़ोर हो गए हैं और याददाश्त लगभग जा चुकी है। उनके लिए किसी को पहचान पाना भी मुश्किल है। अपने अजीज शायर को इस हालत में देखकर कलेजा मुंह को आ जाता है। ये ब्लॉग लिखने का भी ख्याल उसके बाद ही आया। बशीर बद्र साहब के साथ उनकी बेगम राहत बद्र और बेटे तैय्यब बद्र और कुछ फैंस मानो कोई मुशायरा हो रहा हो। पर शायर कुछ बोल नही पा रहा है। बहुत याद करने पर भी मिसरा याद नही आता। जैसे किसी बच्चे को अलिफ़-बे-ते सिखा रहे हों ठीक वैसे ही उनके कान में कुछ अशआर अधूरे पढ़कर छोड़ दिए जाते हैं। इस उम्मीद में कि शायद वो अधूरी मोहब्बत का शायर उन्हें पूरा कर दे। अलफ़ाज़ सच में किसी के मोहताज़ नहीं होते।वही शायर जिसने मुशायरों में चीख-चीख कर उन अशआर को लोगों की जुबान पर चढ़ाया था आज उन्हें याद भही नहीं कर पाता. ये वही जादूगर है जिसने कभी ये शेर दिलबदी कहा था कि—

हज़ारों शेर मेरे सो गए काग़ज़ की क़ब्रों में,
अजब माँ हूँ कोई बच्चा मिरा ज़िंदा नहीं रहता।

वाकई उनके अमर हो चुके शेर भी उनके ज़हन में आज जिंदा नहीं है।

साठ साल तक जिन्होंने मुशायरों में सिर्फ दाद ही लूटी हो, गुम होती हुई याददाश्त के बीच भी अपने ही शेरों को सुनकर बशीर बद्र साहब की खुशी आंखों में उतर आती है। भोपाल के ईदगाह हिल्स इलाके में उनका आशियाना, वो दर कि जहां एक मुद्दत तक लोगों का मेला लगा रहता था उस घर में अब बस तन्हाई दस्तक देती है। वो अज़ीम शायर जिसने बहुत पहले बदलती दुनिया की नब्ज़ थाम ली थी और कहा था—

कहाँ अब दुआओं की बरकतें वो नसीहतें वो हिदायतें,
ये मुतालबों का ख़ुलूस है ये ज़रूरतों का सलाम है।

वाकई वो ज़रूरतों के ही तो सलाम थे।

जिसने उम्र की एक लंबी पारी एक कामयाब शायर के तौर पर गुज़ारी हो, मुशायरे लूटे हों, वो ज़हन से उतरते शेरों के साथ मंच पर नही जाना चाहता था। बशीर साहब की अदबी महफ़िलों से दूरी की शुरुआत इसी तरह से हुई। पर अफ़सोस तो इस बात का है जितनी तेजी से डिमेंशिया ने उनकी याददाश्त छीन ली उससे दोगुनी तेजी से लोगों ने उन्हें भुला दिया। ऐसे कितने मौके है जहां बशीर साहब के शेर जिंदगी के अंधेरों में रोशनी दिखाते हैं, इज़हार-ए-इश्क का जरिया बन जाते हैं। अफसोस कि अपने हर शेर में हमें राह दिखाते हमारी दुनिया के रौशनदान की कद्र करना हम भूल गए हैं। हमने बशीर बद्र साहब को पिछली बार मुशायरा पढ़ते कब सुना था, अभी हाल में तो फेसबुक पर उनके शेर वाले पोस्ट में दोस्त को टैग किया था।

बशीर साहब का ही शेर है कि—

लहरों में डूबते रहे, दरिया नहीं मिला।
उससे बिछड़ के फ़िर कोई वैसा नहीं मिला।

वो भी बहुत अकेला है, शायद मेरी तरह।
उसका भी कोई चाहने वाला नहीं मिला।

एक जमाना अपने नाम कर चुके आवाम के इस महबूब शायर को जाती याददाश्त से जूझता हुआ और धीरे लोगों के जहन से ओझल होते हुआ देख उनका एक मशहूर शेर याद आता है, वही शेर जिसने उन्हें शोहरत की बुंलदियों तक पहुंचाया, वही शेर जो कभी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के डेस्क से लेकर मीना कुमारी के जुबां पर रहता था, वही शेर जिसने उन्हे आम से लेकर खास लोगों का चहेता बना दिया, वही शेर जिसने बशीर बद्र को बशीर बद्र बनाया—

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।

—अभिषेक आनन्द

सम्पादकीय टिप्पणी—

जब अभिषेक आनन्द जी ने कहा कि वो  “BB की लाइन्स” नाम से एक ब्लॉग सिरीज़ चलाना चाहते हैं तो मुझे बेहद ख़ुशी हुई। अभिषेक जी चाहते थे कि एक बार BB (बशीर बद्र) जी से परिचय कराने के बाद हर हफ़्ते एक ग़ज़ल पर अपने विचार व्यक्त किये जायें। मुझे अभिषेक जी की मेहनत और लेखन-शैली काफ़ी प्रभावित कर गयी। फिर अचानक एक दिन अभिषेक जी कहते हैं कि वो यह सिरीज़ नहीं लिखेंगे, सुनकर बुरा लगा। एक शे’र अपने छोटे भाई के लिए कभी लिखा था वो कहना चाहूँगा—

पुराने फूल का है फ़र्ज़ खुद टूटे महक जाए,

नये गुल को महकने में ज़रा सा डर तो लगता है।

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