29 मई, 2018, हाँ, यही शुभ दिन था जब घर की चिराग कुसुम बेटी की धड़कनें तेज़ हुई जा रही थीं। मन के किसी कोने में उत्साह को दबाये, वो अपनी व्याकुलता का पूरे घर में खुलेआम प्रदर्शन कर रही थी। सूरज सर पे आने लगा था, 11 बज चुके थे परंतु अभी तक माताश्री उसे अन्न का एक दाना तक न चखा पायी थीं। अरे! चखातीं भी तो कैसे? खुद भी तो पसीने से चूते सिंदूर को भौहों तक रोकने में नाकाम थी बेचारीं। बस ये समझ लीजिए कि उनका विक्षुब्ध चेहरा पसीने से तर-बतर नहीं हुआ, तो बस कुसुम के पिता, विमला जी के सुहाग, निष्कपट श्री किशोरीलाल जी की बदौलत। जब बिटिया हो नाराज, बेगम का ग्रसित हो मिजाज, तो महाशय आप रहो नासाज। तभी तो असहाय किशोरीलाल एक हाथ से बीवी को पंखा झल रहे, तो दूजे से जलपान परोस रहे थे। “कुसुम, अभी दो घंटे हैं फ़ोन की घंटी बजने में, आओ पहले कुछ खा लो तुम।” पता नहीं उस कुटिया के किस कोने से आ धमकी कुसुम अपने पिता की आवाज़ सुनकर। “बेटा, रिजल्ट एक बजे घोषित होगा। चाचा गए हैं ना शहर, परिणाम आते ही वो झट से फ़ोन लगाएँगे और फिर हमारा अच्छे कॉलेज का सपना जल्द ही सम्पूर्ण होगा।” “लेकिन पापा, मैंने रिजल्ट तक न खाने की प्रतिज्ञा ली है, और देखो कितनी मोटी भी हो गयी हूँ।” “वज़न घटाने के लिए खाना नहीं छोड़ते, कमज़ोर हो जाओगी। पिछले कुछ दिनों में तुम्हारा पेट कुछ अंदर चला गया है।” सजाई थाली का मुखड़ा देख दसवीं के रिजल्ट से अतृप्त मन भिंडी के निवालों से तृप्त होने को बेकरार था।

कौन हैं वो लोग जो कहते हैं कि समय हमारी मुट्ठी में नहीं होता। समय की लगाम मन में ही बसती है, बस मन की लगाम खींचने में ही अक्सर हम देर कर देते हैं। इसी कारण दो घंटा बिताना कठिन हुए जा रहा था। किसी तरह खींच तान कर एक बजा कि तभी—
ट्रिंग ट्रिंग…ट्रिंग ट्रिंग… ये फ़ोन का निमंत्रण था, या दिल की धड़कन? कुसुम सरपट फोन की तरफ भागी। दूसरी ओर से कुछ शब्द तैरते हुए कानों तक पहुंचे , “हैलो, मैं आधा घंटा पहले ही शहर पहुंच गया था। बिटिया मुबारक, 79..” कानों को शायद ज़्यादा सुनाई दिया हो, अपितु दिमाग में तो बस 7,9 की परिक्रमा चले जा रही थी। वो परिक्रमा सिर ‘में’ थी या सिर ‘की’? सिर ‘में’ होती तो किशोरीलाल का गोद देना शायद अनिवार्य न होता। ये जो उत्सुकता व्याकुलता का रूप लिए जा रही थी, इसी कारणवश विमला जी ने तुरंत पानी का झोंका कुसुम की आंखों पर दे मारा। “क्या हुआ बेटी? कितना प्रतिशत आया?” नैनों में ख़ौफ़, हाथों में कंपन और ज़बान में हिचकिचाहट के अवांछित सहयोग से किसी तरह दो शब्द निकले – सेवेंटी नाईन। क्या आपको अंदाज़ा है कि ‘सेवेंटी नाईन’ शब्दबन्ध बोलने से निकलने वाले कीटाणु आपको मायूस, बहुत मायूस बनाने के लिए काफी हैं? हाँ, माँ-बाप के चेहरे इस सिद्धांत का प्रमाण बखूबी बयां कर रहे थे। “क्यूं रे नालायक, तू तो कह रही थी कि पच्चासी से ज़्यादा ही आएगा। उन्यासी लाकर पड़ गयी कलेजे को ठंडक?” किसी बड़े बुज़ुर्ग ने कहा था कि आँसू का सदुपयोग अगर बच्चों का हक़ है, तो रिजल्ट को हथियार बनाना माँ-बाप के लिए पाप नहीं! कम नंबर का घाव कुछ कम था क्या, जो तानों से माताश्री ने सीधे बेचारी के अहम पर वार किया? अंकों में बढ़ोतरी से कलंकों का घाटा होता है। पर कुसुम का तो फायदा होने को था, उन्यासी से पिताजी का चेहरा पीला जो पड़ गया था। अब तो शायद दाल का प्याला भी कुसुम को नसीब न हो, और ‘ज़ीरो फिगर’ में बेचारी जल्द ही आ जाये! “कुसुम, तुम्हें पता है ना कि दिल्ली के किसी भी नामी कॉलेज में दाखिले के लिए पचासी तो कम-से-कम चाहिए, फिर ये क्या है बेटा? इतने कम नम्बर से अच्छा कॉलेज कैसे मिलेगा? घर का चिराग़ माना था तुम्हे कि तुम दिल्ली की बेहतरीन कॉलेज से पढ़ाई कर बड़ी अफ़सर बनोगी, हमारे ख़्वाबों को सुनहरे पर दोगी। काश इस चिराग़ को और पहले से घिसा होता, तो अंदर सोया जिन्न कुम्भकरण न बन बैठ जाता!

“पापा के शब्द कठोर नहीं होते, हालांकि मार्मिक होने की वजह से दिल भेद ही जाते थे। उनका रोष लाज़मी था, आखिर हमारी कुटिया का हुलिया हर सुबह वेदना का सनसनाता तमाचा जड़ता है। कितने असंवेदनशील हैं ये बोर्ड के नंबर? इस आंगन की मैं आशा की किरण नहीं, तो आशा की कुसुम ही सही, आंगन रोशन नही कर सकती थी, तो कुछ हद तक महका ही देती।” “अरे, नंबर खोने के बाद होश भी खो चुकी हो क्या? किस विषय में कम नंबर आए रे, मूरख?”
“धत्त तेरी की! चाचाजी के मुँह से 79 सुनते ही मेरे हाथ से फ़ोन छूट गया था। आगे पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पायी मैं।”
“शुक्र है थोड़ी लज्जा तो बची है। कोख़ से निकलते वक़्त जितना दर्द दिया था तुमने, उससे कही ज़्यादा पीड़ा अभी महसूस करा रही हो। एक तो लड़की को पढ़ाओ, उम्मीद करो कि परिवार चलाएगी और अब उसके बोर्ड के नखरे भी उठाओ!”
“मेरे आँसू शायद ज़्यादा समझदार थे, जो माँ की वाणी से खुद ही आँख में कही जमे बैठे थे.”
“अब चुप करो विमला। कुसुम, चाचाजी का नंबर देना, वापस फ़ोन नहीं आया अभी तक।”
“इ देखो जी, रिसीवर जगह पर छोड़े तब तो भला कोई फ़ोन कर सके।”
किशोरीलाल जमीन से फ़ोन उठाकर, ज़मीर से हिम्मत जुटाकर नंबर मिलाते हैं..
– हैलो राजेश्वर?
– नमस्ते भैयाजी
– कुसुम के नंबर के साथ हमारा सपना भी डूब गया।
– भैयाजी, नंबर कम थोड़े हैं।
– क्या बक रहे हो? उन्यासी में कौन सा कॉलेज लेगा दाखिला?
– उन्यासी, ये किसने बता दिया? राम राम! गजब अनर्थ हो गया…
– राजेश्वर, इस उमर में भी तमाचा खाना है क्या? दोनों पक्ष खुद ही रख रहे हो।

कुछ पल्ले नहीं पड़ रहा? ये दिल द्वारा नियंत्रित दिमाग का जो हिस्सा है, एकदम रसोई के चूल्हे की उस आँच की तरह नाज़ुक है। एक तो स्पष्ट रूप से इसके प्रज्वलित होने का समय निश्चित नहीं। जो एक बार ये बुझ गया, कम्बख़्त फ़िर बिना चिंगारी दिखाए दोबारा दर्शन नहीं देगा।
चलिए, थोड़ा पीछे की ओर रुख करते हैं। उसी दोपहर 1 बजे – “हैलो, मैं आधा घंटा पहले ही शहर पहुंच गया था। बिटिया मुबारक, 79….
…बिटिया मुबारक, 79 किलो की हो गयी तुम अब, कुल 5 किलो वज़न घटाकर। रिज़ल्ट आने में आधा घंटा बचा था तो सोचा कि तब तक तुम्हारा मेडिकल रिपोर्ट ही ले लूँ। हैलो? हैलो? अरे! फ़ोन कैसे कट गया?”

व्याकुलता से कुसुम का दिमाग, या यूँ कहिये कि दिलवाला दिमाग, चूल्हे की आँच की तरह 79 सुनते ही बुझ गया था। अब माँ-पिता के तानों में चिंगारी तो थी नहीं जो उसकी आगे सुनने की इच्छा जीवित रख पाती।

– वो तो शुक्र है भगवान का कि 9-10 किलो कम नहीं हुआ, वरना आज बेचारी कुसुम की पंखुड़ियाँ उधेड़ दी जातीं! राजेश्वर, आते वक़्त शहर से एक किलो कुसुम के प्रिय बूंदी के लड्डू ले आना।

बूंदी के लड्डूओं ने कुसुम के सारे आँसू पिघला दिए।
“पापा, ताना खा-खाकर पेट भर गया है मेरा। बूंदी के लड्डू के लिए कोई जगह नहीं…”
“हट पगली, अब तो 5 किलो वज़न कम भी हो गया है तेरा। सुनती हो, एकदम सही नालायक कही थी इसको तुम। बिना पूरी बात सुने ही फ़ोन धड़ रोने बैठ गयी।”
“क्या बके जा रहे हैं, पतिदेव? दोनों भाइयों ने मिलकर मेरी बी.पी. को नई ऊंचाइयां देने की ठानी है क्या आज?”
“अरे, 79 तो इस धम्मो का वज़न है, जो रिजल्ट के पहले राजेश्वर ने इसको खुश करने हेतु बता दिया। अब सुनो…कुसुम ने… बोर्ड में…पूरे…”
“ये डांस इंडिया डांस का फाइनल लग रहा है आपको? लाइये फ़ोन दीजिये, भैयाजी से ही पूछ लेती हूँ।”
“कुसुम को आए हैं पूरे 93 परसेंट नंबर!”
सटाक! पड़ा कुसुम के गाल पर। “क्या ज़रूरत थी रे फ़ोन पटकने की? बेवजह तुम्हारी काबिलियत पर शक़ कर बैठे हम।”
अजी, काबिलियत तो कटघरे में आयी ही, साथ ही लड़की को शिक्षा देने के इतने उच्च फैसले को मुजरिम की नज़र से देखा गया। और गुनहगार कौन? ये ‘जल्दबाज़ी’ ना दिलवाले दिमाग को झट से सक्रिय कर देती है। सही मायने में, जल्दबाज़ी का काम शैतान का होता है। अब शैतान महिषासुर पर प्रहार दुर्गा माँ का था, तो कुसुमासुर पर विमला माँ का ही सही!

– तनय केडिया

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मैं शायर तो नहीं, but your curvy brows infused poesy.

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