कुबेर का हाथ नहीं है;

पर वक़्त की बरसात है.

क्या इस सावन मेरे साथ बरसोगे?

क्या तुम मेरे साथ चलोगे?

 

शान्ति की सौगात नहीं है;

शोर भरी ये रात है.

क्या इस अमावस मेरे साथ डूबोगे?

क्या तुम मेरे साथ चलोगे?

 

सफलता की ज़मानत नहीं है;

वादों की बैसाख है.

क्या ज़िन्दगी के मौसम ऐसे टहल सकोगे?

क्या तुम मेरे साथ चल सकोगे?

 

दुनिया की समझ नहीं है;

नादान ये जज़्बात है.

क्या मेरी तरह यूँ बिखरोगे?

क्या मुझे अपना सकोगे?

—जतिन अग्रवाल

Like & Share this post

Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *