काठ की गुड़िया.
बचपन का ज़रिया.
निर्धन हूँ,
बापू की बुचिया.
ज़िद कर डाली,
लाने को कंचे.
बैठा भेड़इया दूर कहीं.
ले आये पटरा-सटरा,
आकार दिया, दिन रात दिया.
कपड़े सिले, पहनाये.
हाथ दिया मैं ना मानी;
बापू समझाते यही बढ़िया,
काठ की गुड़िया.

काहे रोती?
मत रो बुचिया!
बहके मन को जोत दिया.
माई ने गोद भरा,
कहती—यह सब मोह भरा!
मेरी गुड़िया!
बापू मेरे भी यही किया;
तू भी रख ले,
काठ की गुड़िया.

कई वर्ष हुए.
मैं नर्स हुई.
उगते जीवन का हर्ष हुई.
नन्ही हथेलियाँ स्पर्श हुईं.
मैं स्वावलंबी उत्कर्ष हुई.
बापू तुमने साकार किया.
सपना मेरा,  विश्वास किया.
अर्थ दिए, सामर्थ्य दिए.
अब रोज़ बनाती;
प्राण की गुड़िया,
संसार की गुड़िया,
धनवान की गुड़िया,
अनजान की गुड़िया.
बस बना ना पायी,
वरदान की गुड़िया;
काठ की गुड़िया.

माँ के संघर्षो को प्रणाम!
बापू तुम सबसे महान!
रस्ता ये अलग तुमने ठाना.
बेटी को बेटा माना.
चूल्हे-चौके थे अभिमानी.
तुमने उनकी भी ना मानी.
दुनिया तो दस्तूरी है,
बस एक लहर जरूरी है.
अब नील गगन के साये में,
सोते हो सम्मान लिए.
हर करवट पर, उस खटिया.
निहारती तुम्हें,
सम्मान की गुड़िया;
काठ की गुड़िया.

—नितिन राय

एम.टेक. (द्वितीय वर्ष)

सिरेमिक अभियांत्रिकी विभाग, आई.आई.टी. (बी.एच.यू.)

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