पहली प्रस्तावना: मैं अक्सर कहता हूँ कि श्रीकृष्ण एक अच्छे राजनीतिज्ञ थे. यहाँ तक कि उन्होंने ‘फूट डालो, आराम से रहो’ की नीति अपनाई. कौरवों और पांडवों को आपस में लड़ाकर एक पक्ष का साथ दिया और हस्तिनापुर राज्य के पड़ोस में ही द्वारका बसाकर चैन की बंशी बजाने लगे. मथुरा से भाग आये थे क्योंकि जरासंध परेशान करता था. इसे राजनीति कहते हैं.

दूसरी प्रस्तावना: मैं अपनी बात बताता हूँ, जैसे भारत देश एक लम्बे समय से समाजवाद और पूँजीवाद के बीच रहा है वैसे ही मेरा परिवार एकल परिवार और संयुक्त परिवार के बीच की एक संस्था रहा है. ऐसे परिवारों में अक्सर आप सुनेंगे कि बहुत कम ही सही पर सास-बहू-ननद में कोई न कोई बहस और पीठ पीछे बुराईयाँ होती रहती हैं. इसे प्रपंच कहते हैं.

तीसरी प्रस्तावना: राजनीति अर्थात राज करने की नीति. इस शब्द की सबसे पुरानी विवेचना मैंने कौटिल्य लिखित अर्थशास्त्र में पढ़ी है. 

आपने अपने आस-पास बहुतेरे लोगों को कहते हुए सुना होगा कि “पॉलिटिक्स है”. कभी विश्वविद्यालय की, कभी कॉलेज की, कभी ऑफिस की या किसी और वर्किंग प्लेस की, किसी संस्था में, या फिर घरों में, हर ज़गह आपने ये ज़रूर सुना होगा कि “पॉलिटिक्स है”. आप में से कुछ लोग जो किसी ना किसी संस्था के मुखिया/अध्यक्ष/कार्यकर्ता होंगे, वे ज़रूर कुछ फैसले लेते होंगे और उसके बाद खुद पे गर्व भी करते होंगे कि मैंने कूटनीतिक (diplomatically) और राजनैतिक (politically) तौर पर सही फैसला लिया है.

मुद्दे पर आते हैं. हमारे संस्थान की तरह आपके संस्थान में भी बहुत सारे क्लब्स/ग्रुप्स/काउन्सिल्स/सोसाइटीज/पार्लियामेंट आदि होंगी. हर संस्थान में इनके काम करने के नियम और ढंग अलग होते हैं. कुछ संस्थानों में प्रत्यक्ष रूप से प्रोफेसर्स और वर्किंग स्टाफ का हस्तक्षेप होता है; कुछ संस्थानों में यह अप्रत्यक्ष रूप से होता है; और वहीं कुछ संस्थानों में यह हस्तक्षेप न के बराबर होता है. आपने अपने-अपने संस्थानों में अक्सर ये देखा होगा कि ये सारे क्लब्स/ग्रुप्स/काउन्सिल्स/सोसाइटीज आपस में मनमुटाव रखते हैं. ऐसा बहुत कम होता है कि किसी संस्था में स्वतंत्र छोटे समूह आपस में मिलकर चलें. प्राकृतिक रूप से ऐसा सम्भव भी नहीं है क्योंकि आये दिन उनमें हितों के टकराव होते रहेंगे जिससे मन मुटाव बने रहेंगे, यह मानव प्रवृत्ति है.

जब समूहों में हितों का टकराव होता है तो एक तरह का शीत युद्ध प्रारम्भ होता है. वही एकदम अमेरिका-रूस वाला. कभी-कभी भावावेश में आकर किसी समूह के कुछ सदस्य उस युद्ध को प्रत्यक्ष रूप से लड़ने लगते हैं. एकदम पाकिस्तान या चीन जैसे रोज़-रोज़ विवाद पैदा करने वाले सदस्य. आंतरिक कलह का सार्वजनिक होना कभी सुखदायी नहीं होता क्योंकि इससे हमेशा दूसरे फ़ायदा उठाते हैं. ठीक वैसे ही जैसे ब्रिटिशर्स ने भारत आकर फ़ायदा उठाया. ऐसा ही नहीं है, कुछ समूह भारत की तरह भी होते हैं और शान्ति-वार्ता से मुद्दों को सुलझाना चाहते हैं.

इस पूरे घटनाक्रम को हम एक सर्वसम्मत नाम देते हैं—कॉलेज पॉलिटिक्स. अब आप अपने आस-पास एक समूह के लोगों को दूसरे समूह के लोगों की बुराई करते हुए सुनते होंगे. या यह सोचते होंगे कि फलां व्यक्ति कितनी राजनीति/पॉलिटिक्स खेलता है. या फिर ऐसे सुनते होंगे की अमुक व्यक्ति माइंड-डाइवर्ट/ब्रेन-वाश कर देता है. झूठ बोलता है, अनैतिक कार्य करता है, विश्वासघाती है. ऐसा करके वह न केवल अपनी सार्वजनिक छवि को खराब करता है वरन अपने स्वाभिमान और व्यक्तित्व को हानि पहुँचाता है. (सार्वजनिक छवि इतनी महत्वपूर्ण नहीं—कुछ तो लोग कहेंगे…) स्वाभिमान और अपनी नज़र में अपना व्यक्तित्व महत्वपूर्ण है.

यह उपरोक्त घटनाक्रम पॉलिटिक्स नहीं प्रपंच है. प्रपंच इसलिए कि सास-बहू-ननद के झगड़े जैसे ही इन झगड़ों और ओछी हरकतों से आपको कुछ हासिल नहीं हो रहा, सिवाय छद्म आत्मसंतुष्टि  के.

यह सब आप किसलिए कर रहे हैं? एक समूह विशेष के लिए? एक सोसाइटी/क्लब/काउंसिल के लिए? क्या आप जब कॉलेज से निकल जायेंगे तो आपको कोई जानेगा? जितना प्रपंच आपने किया क्या कोई उसका गवाह होगा? क्या आप जानते हैं कि आपसे छः साल पहले आपके पद पर कौन छात्र था और उसने क्या किया? छद्म-आत्मसंतुष्टि के लिए किये गये कामों के कारण आपके व्यक्तित्व में जो ह्रास हुआ है, क्या वह कभी भरेगा? या फिर आपको कोई बड़ा राज्य मिल रहा है; विधायक-सांसद बनने वाले हैं? आपको बड़े आर्थिक फ़ायदे हो रहे हैं? ऐसा नहीं है ना?

कहा जाता है कि जहाँ चार बर्तन होते हैं वहाँ शोर तो मचाएँगे ही. पर यदि बर्तन स्थिर हों, अपने काम से काम रखें, आराम से सामंजस्य बिठाकर चलें तो कोई खटक नहीं होगी. बेहतर है कि आप जहाँ पर हैं वहाँ पर बेहतर काम करें. वहाँ से नेतृत्व और प्रबन्धन का अनुभव लें जिसे आप आगे चलकर वास्तव में किसी बेहतर और बड़े लक्ष्य की प्राप्ति में प्रयोग कर सकें. और कुछ ऐसा ना करें जिसका परिणाम आपके बाद उस पद पर आने वाले लोगों को भुगतना पड़े. विज्ञान मानता है कि प्रेम पहला भाव है जो मनुष्य के अंदर आया. इसी भाव से चलें; बिना कोई ओछी हरकत किये हुए भी आप अपना और अपने समूह का भला कर सकते हैं.

कैसी भी रिलेशनशिप हो दो लोगों के एक होने की संभावनाएँ हमेशा रहती हैं. पर कभी-कभी हम कोशिश नहीं करते और कभी-कभी कोशिश कर के थक जाते हैं. मैं आज भी अगर एक साहित्य और कला प्रेमी होने के नाते सोचूँ तो सोचता हूँ कि, क्यों किसी चित्रकार की पेंटिंग या चित्र पर एक कविता या कहानी नहीं लिखी जा सकती? क्यों संगीत बजाने वाले साहित्यकारों से गाने नहीं लिखवा सकते? क्यों स्टेज पर मोनोएक्ट/नाटक करने वाले लोग साहित्य से शब्द उधार लेकर उसमें अपने हाव-भाव नहीं मिला सकते? ऐसी ही संभावनाएं हर ज़गह हैं, हर सोसाइटी, क्लब, ग्रुप को आन्तरिक रूप से एक धागे में बाँधा जा सकता है. ज़रूरत है तो अमल करने की. ज़रूरत है तो परस्पर सहयोग की. म्यूच्यूअल कोऑपरेशन.

टिप्पणी: यह विचार लेखक के निजी विचार हैं. साईट प्रबन्धन और स्वामी संस्था इनसे इत्तेफ़ाक नहीं रखती.

 

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About me? Who cares! 😛

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