प्रिय मृत्यु!

आख़िरकार तुम आ ही गयीं! जिस चीज़ का डर था वो हो ही गया।अब इससे पहले कि तुम मुझे अपनी बाँहों के आग़ोश में लेकर मेरे होंठों को सदा के लिए चूम लो, मैं कुछ स्वीकार करना चाहता हूँ, तुम्हारी सहेली ज़िन्दगी के बारे में।

हमारा प्रेम-प्रसंग चल रहा था, सालों से! तुमने सही सुना, मेरा और ज़िंदगी का प्रेम-प्रसंग चल रहा था। पर मैं क्या करता मुझे इस चीज़ का अंदाज़ा लंबे वक़्त तक नहीं हो पाया था की तुम दोनों बचपन की सहेलियाँ हो, वरना मैं तुम्हें कभी धोखा नहीं देता। लोगों ने मुझसे कहा था कि तुम एक रोज़ आओगी पर मुझे लगा की ये झूठ है। आज पता चला कि लोगों की यही एक बात सच निकली। मुझे सारा सच साफ़ दिख रहा है आज। ज़िंदगी, जिसे मैंने अपने जान से भी ज़्यादा चाहा था वो मुझे छोड़ कर चली गयी और तुम मेरे दरवाज़े पर हो। कैसे इतना इंतज़ार कर सकता है कोई ? हे मृत्यु ! तुम हीं सच्चा प्रेम हो। साथ रहने का वादा करके सब छोड़ देते हैं, और तुम बिना किसी शर्त के साथ निभाने चली आती हो।

इतने दिनों मैंने ज़िन्दगी के साथ बहुत कुछ किया। हम सावन की पहली बारिश में साथ भीगे। उसके बदन पर मोतियों-सी रुकी हुई बूँदों को अपने होंठों से पिया मैंने। उसके साथ अपना घर-बार सब छोड़ के किसी बियाबान में अपना हसीन घर बनाया हमने। कभी मैंने उसे अपने कंधे पर बैठाकर दिन-भर सफ़र किया। तो कभी उसके गोद में उसके हाथों की कोमल थाप पर रात-भर सुकून से सोया मैं। नहीं, नहीं। ये सब मैं तुन्हें ईर्ष्या से भरने के लिए नहीं कह रहा हूँ। मुझे ग़लत मत समझना। मैं बस इतना चाहता हूँ कि अगर हमारा आगे कोई रिश्ता बनता है तो बीच में मेरा अतीत कभी न आने पाए।

पर इतना कुछ होने के बाद कुछ ऐसा हुआ जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी। जिन होंठो से हर सुबह मैं इज़हार-ए-इश्क़ सुना करता था, उसने एक रोज़ मुझसे कहा- ‘मैं जाना चाहती हूँ’। मैं उनींदी आँखों से किसी की जाती हुई तस्वीर ही देख पाया बस, और ख़्वाब समझ के सो गया। परंतु फ़िर झटके से आँखें खुली तो पाया मेरी ज़िंदगी जा चुकी थी। मेरा मतलब ज़िंदगी जा चुकी थी। मैं हतप्रभ होकर बस वहीं बैठकर बेहोश हो गया था।

फ़िर आँख खुली तो मैंने पाया कि मेरे आस पास लोगों का जमघट लगा है और सभी मुझे इस त्रासदी से सामान्य कराने की कोशिश कर कर रहें हैं। मैं बिना किसी से कुछ कहे उठकर चला गया। मैंने अपना सामान बाँधा और वो जगह छोड़ कर चला गया जहाँ हमारी यादों के अलावा और कुछ नहीं था। उस समय मैंने तुम्हारी बहुत ख़्वाहिश की थी, मृत्यु। मैं आतुर था कि तुम आओ और मुझे ले जाओ। परंतु वक़्त के साथ चीज़े सामान्य हो गयी।और मैंने तुम्हें और ज़िंदगी दोनों को भुलाकर बस जीना शुरू कर दिया। मैंने नई यादें बनाई और अपने आप से प्यार करना सीखा।

और आज जब तुम मुझे लेने आयी हो तो मैं सहर्ष तैयार हूँ। तुम्हारे साथ का रिश्ता भी उतना ही रोमांचक होगा जितना ज़िन्दगी के साथ था। मैं ज़िंदगी के साथ स्वयं बँधा था और आज वो डोरी स्वयं ही तोड़ कर आज़ाद हो चला हूँ। अब कोई दूसरी ज़िंदगी के साथ जीने का कोई इरादा नहीं मेरा।अब बस मैं और तुम हैं। आओ, मुझे चूम लो।

केवल तुम्हारा

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About Aman Sharma

कबसे से खुद को जानने की कोशिश कर रहा हूँ, कोई बतला दे मुझे ये मोहब्बत इस जहाँ में नहीं तो किस जहाँ में है, कोई दिला दे मुझे । किसी दिन फुर्सत में होंगें तो लिखेंगे खुद के बारे में फ़िलहाल की ख़ातिर हमारे लफ़्ज़ काफ़ी हैं । कवि, लेखक या शायद कुछ भी नहीं ।

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