“तुम समझते क्यों नहीं हो श्वेतांक शौक़ के लिये लिखना अलग बात है. तुम बहुत अच्छा लिखते हो, लेकिन सिर्फ प्यार भरी शायरी सुनकर पेट की भूख नहीं मिटती, ये कहानियाँ आपकी ख्वाहिशें पूरी नहीं कर सकतीं. सोसाइटी में जीने के लिये एक स्टेटस बना कर चलना पड़ता है. अब या तो तुम कोई कोर्स चुन लो जिसमें जॉब मिल जाए या फिर मुझे भूल जाओ.”

“तृप्ति तुम समझती क्यों नहीं लिखना मेरा पेशा ही नहीं मेरा प्यार है, भूलना तो बहुत दूर की बात है. जब किसी जॉब वाले कोर्स में मेरा मन नहीं लगता वो क्यूँ चुनूँ?”

“देखो श्वेतांक तुम्हारे ही कहने पर मैं  BHU से डिप्लोमा कर रही हूँ, अब तुम ये सोच लो, तुम्हें उसी घिसे पिटे हिंदी डिपार्टमेंट से MA करना है या तुम यहाँ कोई ढंग का कोर्स ले रहे हो. भला बायो-टेक्नोलॉजी से ग्रेजुएशन करने के बाद हिंदी से पोस्ट-ग्रेजुएशन का क्या लॉजिक है?”

“सॉरी तृप्ति! मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ मगर मैं खुद के साथ समझौता नहीं कर सकता.”

“ठीक है जैसा तुम ठीक समझो. मैं जा रही हूँ. लौट कर नहीं आऊँगी. कभी नहीं…बाय”

कुछ टूटा मगर आवाज नहीं आई. सारी आवाजें सन्नाटे के शोर में दब गयीं. अगर श्वेतांक लेखक ना होता तो शायद कुछ करता, रोता-गाता, सवाल करता मगर नहीं बुत बना खड़ा रहा. उस दिन एक शायर ने एक आशिक़ को हरा दिया.

ये सब कुछ यूँ शुरू हुआ था… तक़रीबन दो साल पहले.

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के वार्षिकोत्सव स्पंदन में एक काव्य प्रतियोगिता के मंच पर एक 18-19 साल का लड़का बड़े ही गंभीर लहजे में पढ़ रहा था-

“अगर मौत के बाद भी कोई ज़िन्दगी हो,

चाहतों का थोड़ा सा बसर हो;

तो दुआ यही है रब से, कि उस सफर में,

तू मेरा हमसफ़र हो,

उस सफ़र में भी तू मेरा हमसफर हो.

धन्यवाद !”

इतना बोल कर वो दुबला-पतला सा ढाँचा अपनी जगह पर बैठ गया. मगर तृप्ति के कानों में अभी तक ये पंक्तियाँ गूँज रहीं थीं – “अगर मौत के बाद भी कोई ज़िन्दगी हो”.

“क्या बोलता है यार”, तृप्ति ने सुरभि की ओर देखते हुए कहा.

“ह्म्म्म”, सुरभि ने सहमति में सर हिला दिया.

“क्या नाम क्या था इसका?”, तृप्ति ने अनजान बनते हुए सवाल किया.

“श्वेतांक”, सुरभि अब भी अपने मोबाइल में ही देख रही थी कि तभी तृप्ति ने उसका मोबाइल छीना और फेसबुक पर सर्च किया श्वेतांक… 7 म्यूच्यूअल फ्रेंड्स के साथ स्क्रीन पर लाल कुरता पहने एक क्यूट से चेहरे की तस्वीर थी. तृप्ति ने पहले सुरभि के अकाउंट से फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी और फिर अपने से.

राफ्ता-राफ्ता 7-8 महीने हुए थे सुरभि और तृप्ति को BHU आये हुए दोनों MMV में पढ़ती थी. चंदौली के अपने घर से दूर तृप्ति को बनारस, चंदौली सा ही लगता था. वैसे सबको बनारस अपना सा ही लगता है, और यही इस शहर की ख़ासियत है. विश्वस्त सूत्रों से ज्ञात हुआ कि श्वेतांक बायो=टेक्नोलॉजी में ग्रेजुएशन कर रहा है. बड़ी पाबंदियाँ हैं MMV की लड़कियों पर, ऐसा माना जाता है. लेकिन पहलवान चाचा बोलते हैं कि बहते पानी और नई जवानी को रोकना मुश्किल होता है.

उस दिन श्वेतांक ने जब फेसबुक खोली तो 13 नोटिफिकेशंस थे सारे “तृप्ति सिन्हा” के अकाउंट से. हमारे शर्मीले श्वेतांक बाबू के चेहरे पर बॉबी वाले ऋषिकपूर की तरह स्माइल आ गयी झट से फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर मेसेज किया—

“हाय!”

मेसेज रीड हुआ और तीन बिंदियों के साथ “typing” शब्द स्क्रीन पर कूदने लगा, श्वेतांक बाबू को उसमें अपना दिल दिखाई दिया जैसे मानो उनका दिल जंपिंग-ज़पाक कर रहा हो. रिप्लाई आया—

“हेलो!”

“आप MMV में पढ़ती हैं?”

“जी, हाँ! आपकी कविता सुनी स्पंदन में, बहुत अच्छी थी. आप फेसबुक पोस्ट्स भी अच्छी करते हैं.”

“जी, थैंक यू!”

“योर मोस्ट वेलकम डिअर!”

‘डिअर बोली यार लड़की लाइन दे रही है भाई’—श्वेतांक का दोस्त रवि बोला.

“तू चुप करेगा यार, ये लड़की वैसी नहीं है.”

13 दिन की हलकी-फुलकी बात-चीत में एक दिन तृप्ति का मेसेज आया— “आप मंदिर जाते हैं?”

“हाँ अक्सर ही जाता हूँ.”

“तो VT पर मिलते हैं किसी दिन. आपकी कविताएँ आपकी आवाज़ में और भी अच्छी लगती हैं.”

“जी ठीक है कल शाम मिलते हैं 4 बजे.”

“ओके.”

“ह्म्म्म.”

“गुड नाईट.”

“गुड नाईट.”

और इस तरह कुछ महीने गुज़र गए. अक्सर हमें पता ही नहीं चलता कि कब कुछ चीजें रोज करते-करते हमारी आदतें बन जाती हैं. पिछले कुछ महीनों से हर शाम 4 बजे VT आने वाली तृप्ति आज नहीं आई. फ़ोन भी नहीं उठा रही थी, कि तभी उसकी स्कूटी दिखी श्वेतांक भाग कर गया, तो देखा कि उसके साथ एक 50 की उम्र का आदमी और एक महिला खड़ी हुई है. फर्स्ट इयर खत्म हो गया था.

“उसके मम्मी पापा आये हैं उसको लेने. उसने बताया तो था मगर ये तो परसों आने वाले थे आज कैसे? खैर.”

ये सब सोचते-सोचते उसने मेसेज किया तो तृप्ति का जवाब आया कि आज शाम 6 बजे मधुबन में मिलते हैं. श्वेतांक ने भी हामी भर दी.

“भगवान जाने ये लड़की क्या बहाना बनाकर आएगी? 6:10 हो गया है. आएगी भी या नहीं आएगी?” श्वेतांक के अंदर विचारों का सागर उमड़ रहा था जो शायद कभी लिखते हुए भी उसके अन्दर न आया हो.

खैर तृप्ति आई.

“कहाँ थीं? इतनी देर हो गयी? एक मेसेज ही कर दिया होता कि मम्मी पापा हैं. क्यों नहीं किया? कब जा रही हो?” एक ही सांस में इतने सारे सवाल पूछ डाले श्वेतांक ने.

तृप्ति ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में गालों पर आ चुकी लट धीरे से हटाकर कानों पर रखी और बोली.

“यार बस आज रात को निकल रही हूँ.” कुछ देर दोनों इधर उधर देखते रहे फिर तृप्ति बोली—

“आई विल मिस यू यार.”

“आई विल मिस यू टू तृप्ति, अपना ख्याल रखना”.

“कॉल मत करना घर पे ज्यादा बात नहीं हो पाएगी. मुझे टाइम मिलेगा तो मैं तुमको कॉल करुँगी. वैसे तुम्हारे हाथ में ये क्या है?”

अब श्वेतांक बाबू का दिल शताब्दी एक्सप्रेस की स्पीड से धड़क रहा था.

“तृप्ति वो दरअसल”

“हाँ-हाँ बोलो… बोलो”

“वो… मुझे लगता है… ये कहना सिर्फ एक फॉर्मेलिटी सा है लेकिन सोचा जाते-जाते कह दूँ….. आई लव यू तृप्ति.”

और फिर श्वेतांक ने एक लाल गुलाब तृप्ति की ओर बढ़ा दिया.

लगभग 15 सेकंड के समय में सारी गणित लगाकर तृप्ति ने श्वेतांक से फूल ले लिया.

“पागल, इतना कहने में इतने दिन लगा दिए… आई लव यू टू… मेरे शायर, तेरी बहुत याद आएगी सच में… पता नहीं कैसे गुजरेंगे दिन कैसे गुजरेंगी रातें हिहिहिही…”

“चल अब ज्यादा रोमांटिक होने की जरूरत नहीं है… जाओ मम्मी पापा इंतज़ार कर रहे होंगे”—श्वेतांक ने छेड़ते हुए कहा.

आशिकों की तरह से श्वेतांक ने तृप्ति को विदा किया.

और अब इस बात को पूरे दो साल हो गये हैं. ठीक दो साल बाद आज फिर से तृप्ति के ग्रेजुएशन का तीसरा साल खत्म हो रहा है.

लेकिन अब ये तृप्ति वो तृप्ति नहीं रही अब इसके कुछ सपने हैं, एक भविष्य है, ख्वाहिशें हैं. ख्वाहिशें-इच्छाएँ जिनकी ‘तृप्ति’ श्वेतांक नहीं कर सकता था. इसलिए वो जा रही थी श्वेतांक को छोड़कर.

दरअसल पहली मोहब्बत उम्र की गलती होती है जो धीरे-धीरे समझ आती है.

कुछ तथाकथित एंटी-फेमिनिस्ट कहते हैं कि खूबसूरत लड़कियों का क्या है… वो गाना याद है ना … अभी रूप का एक सागर हो तुम…. कँवल जितने चाहोगी खिल जायेंगे…कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे….(गीतकार संतोष आनंद जी के शब्दों में )

“मीत ना मिला रे मन का.” यही गाना गुनगुनाते हुए आ रहे थे करन बाबू. करन स्मार्ट था, KTM की बाइक भी थी, आई आई टी वाली टी शर्ट भी, मगर बेचारा बड़ा बेकरार था, अंग्रेजी में बोलें तो ‘डेस्पेरेट’.

कुछ आई आई टी वालों का हाल यही है. खैर कुछ महीने पहले LC पर देखा था तृप्ति को पहली बार यूँ तो करन बाबू को अकारण ही हर दूसरी लड़की से प्यार हो जाता था लेकिन तृप्ति के नैन-नक्श बहुत तीखे थे ऊपर से चेहरे का भोलापन.

“हाय अल्लाह, मर जावां” यही बोला था करन ने उसे देखकर. जोकि शायद तृप्ति ने सुन लिया और उसके निवेदन को स्वीकार करते हुए एक मीठी सी मुस्कान उसकी और फेंक दी थी.

तृप्ति का हर रोज उसकी तरफ देखकर मुस्कुराना उसकी हिम्मत बढ़ाता रहा. और एक दिन जब पता चला कि मोहतरमा मॉस कम्युनिकेशन में डिप्लोमा कर रही हैं तो करन ने बोला

“कभी हमसे भी कम्युनिकेशन कर लिया करो”

“क्यूँ जरूरत क्या है?” तृप्ति ने बनावटी गुस्से से पूछा.

“ज़िन्दगी में कब कहाँ ना जाने क्या काम आ जाय, इसलिए हमेशा दोस्त बनाते रहिये”—करन बोला.

“अच्छा जी.”

“हाँ जी.”

ये गुफ्तगू LC से शुरू होकर फेसबुक, व्हाट्सएप्प की गलियों से होते हुए… मोहब्बत के शहर तक आ गयी.

“पता नहीं कितने गरीब आशिकों का प्यार ये साले इंजिनियर डॉक्टर मार ले जाते हैं…”—राँझणा पिक्चर में डायलाग था.

रवि ने KTM पर जाती हुयी अपनी भूतपूर्व भाभी जी को देखते हुए कहा और श्वेतांक के शांत चेहरे को देखते हुए अपनी बात जारी रखी—

“…लेकिन क्या ले गयी तुम्हारा श्वेतांक बाबू आपने भी एक सुपरहिट ग़ज़ल संग्रह लिख डाला, तुम शायरों की दसों उँगलियाँ घी में होती हैं चित भी तेरा पट भी तेरा”

“वफ़ा कर दो तो शायर हूँ…

जफा कर दो तो शायर हूँ”—श्वेतांक बोला

“जफा मतलब?”—रवि ने पूछा

“अपोजिट ऑफ़ वफ़ा”—श्वेतांक रुखाई से बोला.

अक्सर LC पर खड़े लोगों की नजर लग जाती है बेचारे कपल्स को. दरअसल कुछ लोग प्यार के नाम बड़ी ग़लतफ़हमी में जीते हैं. उधर, KTM पर सवारी करते हुए तृप्ति को 6 महीने हो गये थे. इंजिनियर बॉयफ्रेंड ऊपर से स्मार्ट और फिर पैसे वाला. तृप्ति की सारी वासनाएँ तृप्त हो रहीं थीं जब तक कि वो दिन नहीं आया, जब करन बहुत गुस्से में था और तृप्ति बोली-

“क्या हो गया करन?”

“तृप्ति बी सीरियस, स्टॉप दिस, प्लीज़.”

“पर हुआ क्या?”

“मुझे लगता है कि मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता.”

“क्यूँ?” तृप्ति की गहरी आँखों में आ चुके समन्दर में पार्क की स्ट्रीट लाइट रिफ्लेक्ट होने लगी थी.

“तृप्ति मुझे लगता है की ये रिलेशनशिप शुरू करने से पहले हम लोगों को एक दूसरे को समझना चाहिए था.”

“क्या मतलब?… करन”.

तभी करन का फ़ोन बजा—”मेरी हर ख़ुशी में हो तेरी ख़ुशी… मोहब्बत में ऐसा जरूरी नहीं”

करन ने फोन स्विच ऑफ कर अपनी बात जारी रखी…

“तृप्ति हमारी लाइक्स-डिसलाइक्स एक सी नहीं हैं… मैं यूट्यूब पर WWE देखता हूँ और तुम जिओ टीवी पर ससुराल सिमर का. यहाँ तक कि तुम व्हाट्सएप्प पर सही से बात भी नहीं करती सिर्फ… ‘ओके, हाँ, अच्छा’  से कोई भी बोर हो जाएगा यार. चलो सेंस ऑफ ह्यूमर नहीं है कोई बात नहीं एडजस्ट कर लूँ. मगर तुम्हें रोमांटिक बातों के अलावा कुछ समझ में ही नहीं आता”.

“आई लव यू करन, तुम जो बोलोगे मैं वो करूँगी प्लीज अब गुस्सा न हो”.

“नहीं तृप्ति लेट मी से, मैंने जब तुम्हें देखा तो तुम्हारे चेहरे से प्यार हो गया था. लेकिन शक्ल के साथ जिंदगी नहीं बिताई जा सकती, अंडरस्टैंडिंग भी कोई चीज होती है… हमारे बीच है ही नहीं. I love you Tripti but I can’t compromise with myself. I feel very pressurized in this relationship. I wanna stop all this…I can’t continue… sorry, Tripti”.

“तुम्हारा मतलब कि मेरा IQ कम है”.

“नहीं ऐसा नहीं है तृप्ति बस हममें बहुत अंतर है”.

“हाँ होगा ही कहाँ तुम आई आई टी से और कहाँ मैं”.

“प्लीज गलत मत समझो तृप्ति, मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा”.

“मैं सब समझ गयी करन… तुम्हें क्या चाहिये और मुझे क्या. I too can’t compromise with my self-respect… मैं जा रही हूँ…  बाय”—बाय शब्द कहीं उसकी रुंधी हुई आवाज में दब गया. कभी कभी इतना रोना आता है कि आँसू भी नहीं निकलते वही हुआ तृप्ति के साथ.

‘I can’t compromise with myself’—ये ठीक वैसे ही था जैसे श्वेतांक ने बोला था “मैं खुद के साथ समझौता नहीं कर सकता”. बहुत कुछ कहना चाहती थी तृप्ति मगर क्या कहती. आज उसे समझ में आ रहा था कि उस दिन श्वेतांक सब चुपचाप क्यूँ सुनता रहा था, उसके जाने पर कुछ क्यूँ नहीं बोला. क्यों नहीं रोया था, क्यूँ नहीं रोका था. क्योंकि इंसान को कभी भी, किसी के लिए भी खुद के साथ समझौता नहीं करना चाहिए.

और रही बात IQ की तो वो तजुर्बे से छोटा ही होता है. शायद IQ कम हो तृप्ति का लेकिन तजुर्बा बहुत आ चुका था. 23 की उम्र में कुछ ज्यादा ही तजुर्बा आ गया था, किसी लेखक के जैसा.

कुछ लोगों का दिल जब टूटता है न तो वो रह जाता है मात्र शरीर का एक अंग जो खून दौड़ाता है; भावना रहित, बिना अहसास की एक मशीन; बस इतना ही.

और कुछ लोग होते हैं जिनका दिल जब टूटता है तो बन जाता है एक खोखला पत्थर जिसमें भरी हुयीं हैं सारी भावनाएँ, सारे अहसास, सारे आँसूं जो रिसते रहते हैं कभी आँखों से या कभी मुँह से या कभी कलम की स्याही से.

तृप्ति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. आज पहली बार उसे पता चला कि श्वेतांक ने उसपर क्या असर किया था क्योंकि आज तृप्ति ने एक नज्म लिखी थी—

पूरी कर लेती मरने के बाद…

अगर अधूरी हमारी आशिकी होती,

काश मौत के बाद भी कोई ज़िन्दगी होती.

काश मौत के बाद भी कोई ज़िन्दगी होती.

—सिद्धार्थ शुक्ला

साभार—

MMV वाली लड़की

Like & Share this post

About Siddhartha Shukla

About me? Who cares! 😛

2 thoughts on “MMV वाली लड़की

  1. “कुछ टूटा, मगर आवाज़ नहीं आई।” 👌🏻😍
    इस कहानी को बयां करने के लिए जिन वाक्यों का इस्तेमाल हुआ है, उससे दिल भी अब मुस्काने लगा है।

    Reply

  2. बड़ी सादा और आसान ज़बान में अपनी रोमानी जज़्बातों को बड़े सलीके से पेश करते हैं आप। हिन्दी-अंग्रेजी-उर्दू को जब अपनी-अपनी सिंहासन से उतारकर आप हमारे सामने पेश करते हैं, तो वे कहीं ज़्यादा खूबसूरत लगती हैं।💝
    एक बात और, ‘श्वेतांक’ में आपका अक्स दिखाई दिया।😅

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *