शिक्षा में एक छोटा सा बदलाव पीढ़ियाँ बदल देती है। पर भारत में ज़्यादातर अशिक्षित लोग आर्थिक कारणों से स्कूल छोड़ देते हैं और ज़ाहिर है कि स्कूल छूटने के बाद पढ़ाई भी छूट जाती है। वहीं वक़्त की माँग कुछ ऐसी है कि शहरों में रिक्शा चालक से लेकर छोटे-छोटे काम करने वालों तक; अंग्रेजी बोलना और समझना सबके लिए ज़रूरी हो गया है। लेकिन इन्हें सिखाने का ज़िम्मा कौन उठाये? सिर्फ अंग्रेजी सीखने के लिए स्कूल वापस जाना इनके लिए संभव नहीं है और न ही कोचिंग क्लासेज़ की महँगी फीस देना। ऐसे में दो अंडरग्रेजुएट लड़कियों की एक पहल, इनकी ज़िंदगी में रौशनी भर रही है।
वासी गोयल और कस्तूरी शाह ने ‘हेलो सीखो’ नाम से अंग्रेजी सिखाने की कॉल सेवा शुरू की है। जिससे भारत के निम्न वर्गीय इलाकों में अंग्रेजी सीखने में बड़ी मदद मिल रही है।
“भारत में ऐसे बहुत बच्चे हैं जो अभी अंग्रेजी सीखने में पहली पीढ़ी हैं। उनके पास वे संसाधन नहीं हैं जिनके साथ हम बड़े हुए हैं। हम उनके स्कूल की पढ़ाई को और बेहतर बना रहे हैं. ये सौभाग्य है कि हम उनके लिए पढ़ाई का प्राइमरी माध्यम बन रहे हैं। लेकिन हमारा मकसद इन बच्चों को स्कूल में बनाये रखना है,” वासी गोयल कहती हैं।
वासी और कस्तूरी प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से अंडर ग्रेजुएट की डिग्री ले रही हैं। दोनों की मुलाक़ात दिल्ली में एक कार्यक्रम में हुई थी। और तब से उनकी जोड़ी ऐसी बनी कि आज इतिहास बन गयी।

वासी याद करती हैं, “हम दोनों ने ये महसूस किया कि हमारी यूनिवर्सिटी में बहुत से ऐसे संसाधन हैं जिन्हें हम पढ़ाई के साथ प्रयोग करके, भारत को दुनिया से जोड़कर परिवर्तन ला सकते हैं।”
अक्टूबर 2013 में, वासी और कस्तूरी ने अपने इस अनूठे विचार पर काम करना शुरू कर दिया।
“हमने एक लिस्ट बनाई जिसमें हमारे सामने आने वाली समस्याएँ थीं, जिनका हमें सामना करना था। उस वक़्त हमें ये एहसास हुआ कि हम दोनों सचमुच शिक्षा के क्षेत्र में कुछ करना चाहते हैं। फिर हमने सोचा कि ऐसा कुछ किया जाए जो सबके लिए संभव हो, और ऐसा एक टूल (साधन) हो जिसे हम अपने आइडिया के लिए माध्यम बना सकते हैं,” वासी बताती हैं।

बहुत सोचने के बाद दोनों मोबाइल फोन के प्रयोग के लिए तैयार हो गयीं। वासी उस दौरान बच्चों की शिक्षा के लिए काम करने वाली एक गैर सरकारी संस्था के साथ काम करती थीं। वे बताती हैं, “ये आइडिया बच्चों के साथ कम्युनिटी में रहने और उन्हें ज़रूरत के वक़्त मोबाइल से जुड़े रहने के मेरे व्यक्तिगत अनुभव से आया। मैंने देखा कि मोबाइल फोन इस वक़्त सबके पास हैं। और यही हमारा बेहतर माध्यम हो सकता है।”
मोबाइल फोन के प्रयोग की सहमति बनने के बाद 2014 तक दोनों ने बिज़नेस प्लान तैयार कर लिया। ताकि उन्हें प्रोजेक्ट के दौरान ज़रूरत भर का फंड मिल जाए। अगस्त 2014 में “हैलो सीखो” पश्चिमी दिल्ली के झोपड़पट्टी इलाके में शुरू हो गया। फिर अगले साल अगस्त 2015 में मुंबई के धारावी क्षेत्र में शुरू हुआ।
आज “हैलो सीखो” में कुल छह लेवल तक के 65 पाठ हैं। हर पाठ 3-4 मिनट का है। जिसमें आसान हिंदी के माध्यम से अंग्रेजी सिखाई जाती है। इसे बहुत आसान और प्रयोग में यूजर फ्रेंडली बनाया गया ताकि ऐसे लोगों को ज्यादा मशक्कत न करनी पड़े जो तकनीकी से नहीं जुड़े है।
‘हैलो सीखो’ से पढ़ने के लिए बड़ी आसानी से टोल फ्री नंबर 1800-3000-0881 डायल कर, अपने स्तर का पाठ चुनकर पढ़ा जा सकता है। ये ठीक उसी तरह है जैसे हम अपने मोबाइल से कस्टमर केयर पर कॉल करके बटन दबाकर सेवाएँ लेते हैं।

वासी बताती हैं कि “कोई भी कॉल करके अंग्रेज़ी के वर्णमाला से लेकर रोज़मर्रा की ज़रूरत के शब्द और बोलने के लिए ग्रामर के साथ-साथ टेंस भी सीख सकता है। शुरुआत में इसके माध्यम से तीसरी कक्षा से लेकर नौवीं कक्षा के बच्चों को टारगेट किया गया था, लेकिन देखते-देखते बड़े लोग भी इससे जुड़ते गए। “
अपनी रेगुलर पढ़ाई के दौरान ही दोनों ने इस प्रोजेक्ट पर काम किया। पढ़ाई से वक़्त बचाकर दोनों ने क्लासेस के बीच-बीच में, इंटर्नशिप और छुट्टियों के दिनों में कड़ी मेहनत से कंटेंट तैयार किया।
कस्तूरी बताती हैं, “हमने एक हफ़्ते साथ-साथ बैठकर काम किया और फिर करीब आठ हफ़्ते अलग-अलग अकेले काम करते रहे। चुनौतियाँ कम नहीं थीं। हम भारत से बहुत दूर बैठकर भारत के लिए काम कर रहे थे। इसलिए हमें अच्छा खासा वक़्त लगाना पड़ा। इसी दौरान हमने ये सीखा कि जब आप किसी काम की धुन में लग जाते हैं और उसे दिल से करना चाहते हैं तो फिर आप उसके लिए वक़्त निकाल ही लेते हैं। यही हमारे साथ हुआ।”
‘हैलो सीखो’ में अब तक तकरीबन 1,65,000 कॉल आ चुके हैं।

वासी कहती हैं, “हमें लगता है कि भारत में अंग्रेजी सीखना एक नौकरी और उससे आर्थिक समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए भी ज़रुरी है। इसलिए हम ऐसे लोगों की तलाश में हैं जो हमारे साथ काम करते हुए न सिर्फ़ अंग्रेजी सीखाने में सहायक हो बल्कि ‘हैलो सीखो’ से उनकी अपनी जॉब अवसर पर भी सकारात्मक प्रभाव डाले।”

(हमारे लिये यह स्टोरी वत्सल द्विवेदी जी ने The Better India के जानिब से लायी है. तस्वीर ‘हेलो सीखो’ की वेबसाइट से साभार.)

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