लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के सामने वाली सड़क पर चहल-पहल तेज़ हो गयी है. सुबह के कुछ 9 बजे रहे हैं. और नवाबों के शहर की शहज़ादी साहिबा अभी तक आराम फरमा रहीं हैं. मोहतरमा जबसे हॉस्टल में आयीं हैं तबसे खुद को डॉक्टर समझने लगी हैं, सुबह 4 बजे शब्बा ख़ैर होती है और सुबह 9 बजे गुड मॉर्निंग. अंगड़ाईयाँ भरते हुए ज़ायरा हॉस्टल की बालकनी में आयी, ठीक सामने रूम नम्बर 107 वाली कृतिका से पूछा कि क्या कृतिका क्लास जायेगी.

“क्या… यार वैसे भी 4 दिन की छुट्टी है तो… आज मॉस बंक हो गया… तुमने whatsapp नहीं देखा” ―कृतिका ने जम्हाई लेते हुए कहा.

“तो… फिर… गुड नाईट” ―ज़ायरा अपने कमरे में घुसी और धड़ाम से बेड पर गिर पड़ी.

तभी मोबाइल की घंटी बजी. ज़ायरा ने ज़बरदस्ती फोन उठाया. मेघा का कॉल था.

“ज़ायरा, तू चल रही है न… अब तो एलिजा भी राजी हो गयी है.”

“हाँ ठीक है…” ज़ायरा ने नींद में ही बोला, “…11 बजे चलते हैं.”

“हाँ ठीक है लेट मत करना… सारी पैकिंग कर ली है ना?” मेघा ने उत्तर सुने बिना ही कॉल काट किया.

ज़ायरा लखनऊ के जानकीपुरम के अलीशा नगर में रहती है. एक बहस करने वाली, जिद्दी-नकचढ़ी और आधुनिक लड़की. लेकिन वो क्या है न कि तहज़ीब और अदाकारी लखनऊ के खून में है, इसलिए ज़ायरा को हलके में लेने की कोशिश ना करियेगा. यूँ तो अब्बा का सपना था की ज़ायरा प्रोफेसर बनेगी लेकिन ज़ायरा का पहला प्यार था डॉक्टरी. बस एक ही बात है ज़ायरा में जो कि डाक्टरों में नहीं होती, ज़ायरा भगवान, अल्लाह, गॉड कुछ नहीं मानती. कई बार आर्यन मज़ाक में बोल भी देता था कि ज़ायरा जब तुम भगवान को नहीं मानती तो मरीजों से कैसे बोलोगी कि “माफ़ कीजियेगा, अब अल्लाह मालिक है” या फिर “अब इन्हें दवा नहीं दुआ ही बचा सकती है.”? और, एक अजीब सी खिलखिलाहट के साथ हँसने लगता. और फिर घंटों दोनों की बहस चलती रहती. ज़ायरा को अपने घर से ही किसी दूसरे की बात न मानने की आदत थी. पापा की शहजादी जो थी.

ठीक 11 बजे मेघा, एलिजा और ज़ायरा अपना बैग लिये आर्यन और शिव का इंतज़ार कर रही थीं. पाँच दिन की छुट्टियाँ थीं इसलिए पाँचों ने बनारस घूमने का प्लान बनाया था. ख़ास बात ये थी कि आर्यन बनारस के एक पुराने ब्राह्मण घराने से संबंध रखता था. यूँ तो प्लान आर्यन के घर पर रुकने का था मगर उसके घर में मरम्मत का काम चल रहा था, इसलिए मम्मी-पापा गाँव गये हुये थे. इसलिए उन्होंने स्टेशन के दूसरी तरफ ही एक होटल में 2 कमरे बुक कर लिये. रात के कुछ 8 या 9 बज रहे थे.

कल का प्रोग्राम तो ट्रेन में ही बन चुका था. आर्यन और शिव अपने रूम में जाते ही सो गये. और उधर―

“मेले पैलों में कित्ता पेन हो लहा है… एलिजा” ज़ायरा बचकाना सा मुँह बनाते हुए बोली.

“तेरी बॉयफ्रेंड नहीं हूँ चल सो जा बड़ी आयीं ‘पेन हो लहा है’… मेरे नहीं हो रहा है क्या?”

और फिर मेघा, एलिजा और ज़ायरा तीनों खिलखिलाकर हँस पड़ी ना जाने कब सन्नाटा छाया और फिर सुबह हो गयी.

अस्सी घाट के सुबह-ए-बनारस से शुरू हुई सुबह, शाम को दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती के वक़्त खत्म हुई. गंगा आरती के बाद घाट से भीड़ खत्म हो रही थी. धीरे-धीरे इक्का-दुक्का लोग ही टहलते नज़र आने लगे. एलिजा को नींद आ रही थी, मेघा और शिव भी काफ़ी थक गये थे सेल्फियाँ लेते-लेते.

“चलो ना… रूम पर” मेघा ने शिव का हाथ खींचते हुए बोला.

“चल ना आर्यन… कब तक बैठा रहेगा यहाँ” शिव ने बोला.

“नहीं यार तुम लोग जाओ… मैं यही हूँ… मैं आ जाऊँगा जब जी करेगा”

“मैं भी कहीं नहीं जा रही… तुम अकेले ही जाओ हुँह…” ज़ायरा बोली.

“मैं भी इधर ही सो जाती हूँ… तुम लोग जाओ… सो रोमांटिक… प्लेस एंड सॉंग” ये बोलते हुए एलिजा ने कान में इयरफोन लगा लिया.

कुछ देर शिव और मेघा तीनों को गुस्से से घूरते रहे फिर वहीं बैठ गये. रात के 11 बज रहे थे. सब लगभग नींद में थे. मगर अभी आर्यन ख़्वाब देख रहा था.

“एलिजा इयरफोन दे ना”―ज़ायरा बोली.

मगर शायद एलिजा गाने सुनते सुनते सो चुकी थी. अब ज़ायरा भी आर्यन के बगल में आकर बैठ गयी. शिव और मेघा एक दूसरे से पीठ सटाकर लगभग-लगभग सो ही रहे थे और एलिजा मेघा की गोद में सर रखकर लेटी हुई थी.

नदी की दूसरी तरफ लगभग ठहरे से पानी में चाँद की परछाईं को देखते हुए आर्यन ने ज़ायरा से सवाल  किया.

“कितना खूबसूरत है ना ये नदी का किनारा?”

“तुमको बहुत अच्छा लगता है ना?” ज़ायरा ने भी एक सवाल कर दिया.

“हाँ मेरा बचपन यहीं गुज़रा पापा के साथ हर सुबह यहाँ तक आना… हर सोमवार मंदिर… आदत सी बन गई थी… और घाट पर पतंग उड़ाती तस्वीरें तो आज तक कैद हैं दिल के कैमरे में.”

“तुम यहाँ बैठ कर अपने चाइल्डहुड को मिस कर रहे हो… ना?” ज़ायरा का एक और सवाल.

“मिस नहीं कर रहा बस याद कर के मुस्कुरा रहा हूँ… अब पापा की उम्र हो गयी है… वो हर रोज यहाँ नहीं आ सकते… मुझे भी पता नहीं ये ज़िन्दगी कहाँ ले जाये… इस शहर से दूर… कहीं?”

“आर्यन बुरा ना मानना एक बात पूछूँ?” ज़ायरा ने फिर से सवाल किया.

“ह्म्म्म… बोलो.”

“बनारस रिलीजियस प्लेस है मैं इसकी रेस्पेक्ट करती हूँ. टूरिस्ट प्लेस है फॉरेन से काफी ज्यादा लोग घूमने आते हैं. बट लखनऊ जैसा डेवलप्ड नहीं है. और फिर मेरे जैसे एथीस्ट लोगों को ना कोई रिलीजियस फीलिंग आती है इन घाटों पर और न कोई रोमांटिक. क्या कहीं कुछ ऐसा तो नहीं जो मैं महसूस नहीं कर पाती? ” उफ़ ज़ायरा ने एक और सवाल किया.

“हा हा हा हा… अच्छा एक बात बताओ…” बड़ी सहजता से आर्यन उसके सवाल का जवाब दे रहा था. शायद आर्यन की यही सहजता और ज़ायरा का भोलापन था जिसने अब दोनों के बीच की दूरियाँ कम कर दी थीं. ज़ायरा थोड़ा सा और आर्यन की तरफ खिसक गयी. आर्यन ने अपनी बात ज़ारी रखी…

“….तुम भगवान या खुदा में विश्वास क्यूँ नहीं करतीं?” इस बार बेचारी ज़ायरा से ही सवालात होने लगे.

“मुझे लगता है ना कि इंसान जैसा करता है, वैसा ही उसे मिलता है. बस जैसी मेहनत वैसा रिजल्ट. इसमें भगवान या खुदा कहाँ आता है? पाँच वक्त की नमाज़ करने या घंटा हिलाने से थोड़े ही ना कुछ मिलता है. कर्मों से किस्मत बनती है भगवान नहीं बनाता.”

“सही कहा ज़ायरा, मगर एक बच्चा अमीर के यहाँ पैदा होता है और एक बच्चा गरीब के यहाँ… अभी तो दोनों ने कोई कर्म करना शुरू भी नहीं किया था. फिर भी उनकी किस्मत इतनी अलग. क्यों?”

“यार तुम सवाल का जवाब सवाल में क्यूँ देते हो? तुम ये कहना चाहते हो न कि जो भगवान करेगा वही होगा इंसान का किया कुछ मायने नहीं रखता? ”

“अरे नहीं मैं ये नहीं कह रहा.  इंसान जैसा करेगा वैसे ही भरेगा. मैं तो बस इतना कह रहा हूँ कि हम क्या करेंगे ये किसी ने पहले से ही तय कर रखा हो तो? और हम बस एक जरिया हों या एक कारण हों… उन चीजों के… जो होती जा रहीं हैं?”

“आर्यन, मैं तुम्हारी तरह इतना डीपली तो नहीं सोचती. लेकिन भगवान या अल्लाह के नाम पर जो भी ढकोसले होते हैं न… दे जस्ट इररिटेट मी. ये भी एक रीज़न है कि मैं इन सब बातों पर विश्वास नहीं करती. यू नो व्हाट मैं कभी घर में भी नमाज नहीं पढ़ती… और अब्बू-अम्मी भी कभी फ़ोर्स नहीं करते. आई डाउट इफ दि गॉड एक्सिस्ट?”

“पता है… ज़ायरा तुम मुसलमान हो न, पूरी दुनिया में मुस्लिम का नाम आते ही ना जाने क्यूँ लोग उन्हें आतंकवादी समझने लगते हैं… ऐके 47 लिये… लम्बी दाढ़ी वाला आदमी. ये हमारे समाज की सोच की गलती है. ठीक वैसे ही जब मैं बोलता हूँ कि मैं भगवान में विश्वास रखता हूँ या मैं ब्राह्मण हूँ. तो लोग मुझे अगरबत्ती जलाने वाला, चन्दन लगाकर एक घंटे तक घंटा हिलाने वाला समझ लेते हैं. जबकि भगवान या अल्लाह को मानने का मतलब ये नहीं है कि आप पूजा करें ही या नमाज पढ़े हीं… ज़िन्दगी में कहीं भी-कभी भी सच्चे दिल से दो पल उसका ध्यान कर लेना काफी है”

“पता नहीं… शायद तुम सही कह रहे होगे. बट मैंने देखा है कि ये जो कलमा या मन्त्र होते हैं… क्या इन्हें बोलना ज़रूरी है… अगर हम उसे मानते हैं ना… तो सिम्पली भी हम उनसे अपनी बात कह सकते हैं”

“हाँ क्यों नहीं कह सकते… लेकिन वो क्या है न कि मम्मी के हसबैंड, दादा जी के बेटे और पापा तीनों का मतलब एक ही है लेकिन हम पापा बोलते हैं न… उनको मम्मी का हसबैंड तो नहीं कहते? कोई देश के लिये अपनी जान देता है तो उसे मरा हुआ नहीं बोलते उसे शहीद बोलते हैं. ठीक वैसे ही कहीं ना कहीं भगवान से अपनी बात कहने का एक तरीका है… बाकी तो फिर सबकी अपनी मर्जी… चाहे जिसे खुदा मानो… चाहे जैसे इबादत करो. लेकिन मानना तो पड़ेगा ही कि खुदा होता है. अगर ना होता तो तुम मेरे काँधे पर अपना सिर रखकर वही नहीं सोच रही होती जो मैं सोच रहा हूँ”

ज़ायरा बातों ही बातों में भूल गयी थी कि वो आर्यन की उँगलियाँ सहलाते हुए उसके काँधे पर सिर रखकर सोच रही थी कि ‘क्या सचमुच इन घाटों में कोई अहसास है… क्या सचमुच चाँद की परछाई इस ठहरे हुए से पानी में खूबसूरत लगती है?’

आर्यन की बात सुनकर ज़ायरा का ध्यान टूटा उसने खुद को सम्भाला… मौसम और घाट की हवा उसपर जो असर कर रहे थे वो उससे बाहर आई और… खुद को सम्भालते हुए बोली.

“मगर फिर भी… मुझे ये खुदा, इबादत, प्यार, मोहब्बत जैसी चीजें अच्छी नहीं लगतीं.”

“हा हा हा हा तुम अपने आगे किसी की बात तो माननी हो नहीं… मगर तुम्हें पता है ये मोहब्बत और खुदा दो ऐसी चीजें हैं जिनपर अगर कोई विश्वास नहीं करता न तो उसकी वजह भी यही दोनों हैं. इन फ़ील्ड्स में जिसे सक्सेस मिल गयी उसे विश्वास हो जाता है और जिसे नहीं मिलती वो कहता है कि ये दोनों चीजें हैं ही नहीं. सिंपल सा कांसेप्ट है कि अंगूर खट्टे हैं.”

“हा हा हा हा सही कहा तो तुम खुदा में तो विश्वास करते हो… पता है… लेकिन क्या मोहब्बत में भी करते हो? क्योंकि मुझे नहीं लगता कि तुम्हें इस फील्ड में कोई सक्सेस मिली है?” ज़ायरा ने खिलखिलाते हुए पूछा.

“तुम्हारी बात में पॉइंट है बेटा लेकिन वो क्या है न कि कभी ट्राई नहीं किया तो सक्सेस या फेलियर का सवाल ही नहीं आता” आर्यन ने ज़ायरा से अपना हाथ छुडाने की नाकामयाब कोशिश की थी.

“तुम इतने शर्मीले हो कि… कभी ट्राई कर भी नहीं पाओगे” ज़ायरा ने उसके काँधे से अपना सिर हटाया और उसकी आँखों में देखते हुए शिकायत सी की.

और फिर… आँखों के बीच की दूरियां कम हुईं… और कम और फिर अब दूरियाँ ख़त्म।

चाँद कहीं शरमाकर आसमान के आगोश में खो गया। सुबह हो गयी थी।
बनारस की सुबह, जिसमें एक लज्ज़त होती है. ज़ायरा ने ऑंखें खोलीं अब वो सुबह की हवा में घाट वाली मोहब्बत और कहीं दूर नमाज की आवाज में इबादत को महसूस कर सकती थी. पंचगंगा घाट पर बनी औरंगजेब मस्जिद को देखकर ज़ायरा ने आज शायद पहली बार सजदा किया था, लेकिन किसे खुदा मानकर… खुदा जाने.

―सिद्धार्थ शुक्ला

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