किसी मंत्री की बीवी के जो पैरों में पड़ी पायल,
या उसके हाथ में हीरे जड़ी कोई अंगूठी है।
इसी के ख़र्च से झुककर गिरा मेरे शहर में पुल;
इसी कंक्रीट में दबकर मरी इक माँ की बेटी है।

महीने भर की है तनख़्वाह हज़ारी, तीस या चालीस।
उसी अफ़सर के घर में है जो ढाई लाख की टीवी।
उसी के रेडिएशन से हुई सीमेंट थी विघटित।
गिरा पुल भरभराकर सो मरी अशफ़ाक़ की बीवी।

ये जो इंजीनियर साहब का बेटा है टशन में यूँ;
पढ़ाई है करी फॉरेन से या हाथों में ऑडी है।
इसी की तेज़ सी स्पीड से हिलकर गिरा है पुल।
इसी लोहे के नीचे पिस गयी अन्ज़ान बॉडी है।

ये ठेकेदार साहब की जो बेटी कर रही मेकअप,
महीने, दो महीने में करे इक लाख की शॉपिंग।
उठा पाया न शॉपिंग वाले बैगों का वज़न ये पुल।
सो दब कर मर गया लड़का जो कल था जा रहा कोचिंग।

हुए थे और भी हिस्से, बढ़ा बैलेंस बैंकों में।
बहुत किरदार हैं जो मौत के किस्से में आयेंगे।
किसी होटल में दारू संग वो काजू छुऐगा जब;
क्या लाशों के ये टुकड़े भी उसी हिस्से में आयेंगे?

―सिद्धार्थ शुक्ला

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