बड़ी खुशी की बात है कि साहित्य सभा, आई.आई.टी.(बी.एच.यू.) ने अपना यह ब्लाॅग शुरु किया है।

हिन्दी और अंग्रेज़ी भाषाओं में कहानी, कविता, निबंध, साहित्यिक आलोचना, फिल्म समीक्षा, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, इत्यादि के रूप में हमारी रोचिभूषित रचनाओं का हर वक़्त आपको इंतज़ार रहे, यही इस ब्लॉग का हासिल होगा।

आपको हमारी सभा के अजस्र-शब्द-वृष्टि-निरत सारे साहित्यिक बंधु अलग-अलग प्रकार की रचनाओं की सौग़ात देते रहेंगे। हमारी रचनाओं में कभी परंपराओं के बंधन में बंधे रहने का संदेश मिलेगा, तो कभी परंपराओं की होलिका भी जलेगी। सामाजिक बंधनों और समाज के तक़ाज़ों से अप्रभावित अपनी मनमर्जी के जीवन की झलक मिलेगी। कभी शारदा के सितार और विष्णु के शंख की मधुरता दिखेगी, रति की सूरत और स्वर्ग की झाँकी की सुंदरता दिखेगी, गंगा के पानी और सावित्री के दामन की पवित्रता दिखेगी, तो कभी सपनों के खंडहर के ऊपर बेबस, लाचार, भटकती, टूटती, रोती ज़िन्दगी। कभी माशूक़ा के दिल का कुंदन बनने की ख्वाहिश होगी, तो कभी प्यार-मोहब्बत के छलावे से दूर रहने की नसीहत। कभी हमारे शब्दों में क्रोध और मात्सर्य की भावना विद्यमान होगी, तो कभी नाज़ुकता, कोमलता और वात्सल्य दिखेगा। खूबसूरत हुस्न की तारीफ़ में ग़ज़ल और वासनामय उद्गार निकलेंगे, तो कभी भूख-प्यास, तड़प और डर के साये में जवां होती नस्लों की बेचारगी देखकर अश्क़ भी बहेंगे। हमारी रचनाएँ समाज और व्यवस्था के दोगले चेहरे बेनक़ाब करेंगी। कराहों और पीड़ादायक स्थितियों को पूरी संवेदनशीलता के साथ आपके सामने परोसा जाएगा। ज़िन्दगी के विविध शेड्स को बहुत ही बारीकी से प्रस्तुत किया जाएगा। कभी उत्ताल तरंगों-सी मचलती उमंग दिखेगी, तो कभी बेखौफ़ आँधी-सी बहकती साँसें। बेफ़िक्री दिखेगी। कभी अनाचार, व्यभिचार और अत्याचार के खिलाफ हुंकार होगा। चीत्कार होगा। कभी उल्फ़त का इज़हार होगा। मदहोशी होगी। कभी भावनाओं का अतिरेक होगा, तो कभी भावशून्यता होगी। कभी वेदना के ज्वार-भाटे में गोते लगाता बेचैन मन दिखेगा, डोलता विवेक दिखेगा, अवसाद के सागर में डूबता विचलित संसार दिखेगा, तो कभी झील किनारे अपनी लैला के साथ बैठकर डूबते सूरज को देखता, मुस्काता मजनू।

संक्षेप में, साहित्य सभा का कैनवास काफ़ी व्यापक है, जिसमें अनुभव के विविध रंग उकेरे जाएँगे। जीवन के सारे उतार-चढ़ाव की विचिकित्सा होगी।

आप सभी पाठकों का अपनत्व मिलता रहे, इसकी उम्मीद है। यहाँ सब कुछ मिलेगा। ज़िन्दगी के हर तूफ़ान में लेखन की यह शमा जलती रहेगी।

जब हसरत सोने लगे, तो हमें पढ़ें। जलती धूप में हल्की हवा चलाते हैं हम। रातभर जगने का बहाना चाहिए या गुनगुनाने को नया फ़साना चाहिए, तो हमें पढ़ें। जब दिल शोर मचाए, जब हृदय भावशून्य हो जाए या जब रिश्ते, भरोसे, चाहत और यक़ीन का दामन साथ न रहे, तो हमें पढ़ें। साहिल धुंधला हो या फ़िज़ा गुनगुना रही हो, दिल तन्हा हो या रागिनी की अभिराम लहर नाच रही हो, हमें पढ़ें। आपके अनगढ़, उलझे, लश्तम-पश्तम ताले लगे मन में नये अरमान, नई आरज़ू जगाएँगी हमारी रचनाएँ।

रचनाओं को जब तक आंकड़ों का सहारा न मिले, एक खालीपन-सा लगता है। लाइक, कमेन्ट, शेयर और फाॅलो के माध्यम से आप अपने स्नेहमयी आशीषामृत की मृदुल ज्योत्सना से हमारी रचनाओं को अभिसिंचित कर हमें अनुगृहित करते रहे। हमारे मन की उड़ान को देखने का आनंद लेते रहे।

हमारी साहित्य सभा के लोगों में जो साहित्यिक बीज है, इस ब्लाॅग के सहारे वे अंकुरित और पोषित-पल्लवित हो सकेंगी। हमें पूर्ण विश्वास है कि सभा के अलमबरदार इस ब्लॉग को वर्डप्रेस-नभ का एक देदीप्यमान सितारा बनाएँगे।

अंत में, राष्ट्रकवि दिनकर के शब्दों में―

सोचने को और करने को नया संघर्ष,

नव्य जय का क्षेत्र पाने को नया उत्कर्ष।

धन्यवाद।

―साकेत बिहारी

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About Saket Bihari

बिहार के शिवहर जिले में बागमती नदी के किनारे एक गाँव आबाद है पहाड़पुर। वह गाँव जहाँ एक ब्राह्मण परिवार में मेरा जन्म हुआ। पला-बढा। नौवीं में था, जब हमारे नवोदय विद्यालय में हिन्दी क्लब बनाया गया। हिन्दी में शायद सबसे अच्छा और मशहूर था उस समय। क्लब का कैप्टन बना दिया गया। और शायद मेरे साहित्यिक जीवन की शुरुआत भी यही से मुझे मानना चाहिए। वैसे साहित्य में रुचि बचपन से ही रही है। चौथी-पाँचवीं में ही डायरी लिखना शुरु कर दिया था। वहाँ अपनी संवेदनाऍ अभिव्यक्त करता था। लेकिन हाँ, छुपकर लिखता था। डायरी मेरा सबसे अच्छा साथी था, जहाँ मैं अपने आप से भी छुपाए हुए राज़ आहिस्ता-आहिस्ता उतारकर उन्हें निहार सकता था। एक दिन चोरी से कुछ दोस्तों ने मेरी डायरी पढ ली। उसके बाद मैंने कभी डायरी न लिखने की क़सम खा ली। कई साल बाद फिर से डायरी लिखना शुरु किया। अपने विचारों को काग़ज़ पर उतारने की प्रतिभा वही से आई। घर मेंं भी बड़ा अच्छा साहित्यिक माहौल था। मेरे दादाजी श्री इंद्रदेव तिवारी 'द्विजदेव' एक सेवानिवृत्त शिक्षक, कवि, गीतकार, गायक और हारमोनियम वादक हैं। साहित्य के क्षेत्र में अपने योगदान के लिए जिला और राज्य स्तर पर कई बार सम्मानित किए जा चुके हैं। मेरी बड़ी दीदी ओमी रानी भी सुन्दर कविताएँ लिखती हैं। इस प्रकार रचनात्मक लेखन के प्रति मेरा झुकाव एक स्वाभाविक घटना थी। एक कारण और भी है। बचपन से लेकर आज तक मेरी अंतर्मुखता ने कभी मेरा पीछा न छोड़ा। ऐसे में कलम की स्याही बड़ी मददगार साबित होती है। इ जो लिखने का रस्ता है न, बड़ा इंटेरेस्टिंग है। बोले तो एकदम क़यामत टाईप। फिलिम में जूही चावला अपनी सहेली सब के साथ जइसन रस्ता से पिकनिक मनाने जाती है न, एकदम ओएसा ही रस्ता है, डिट्टो। जब कभी भी बोर हो जाता हूँ, तो रचनात्मक लेखन का सहारा लेता हूँ। एक सपनों की दुनिया बनाता हूँ। एक ऐसी दुनिया, जिसमें मैं सिर्फ़ साकेत बिहारी होता हूँ। कोई नक़ाब नहीं। मेरे अपने किरदार होते हैं। मेरे हिसाब से घटनाएँ घटती हैं। उस फिल्म का निर्देशक भगवान नहीं, मैं होता हूँ। मैं ज़्यादातर अपने लेखन में अपने हृदय के निकट के विषयों को उठाता हूँ। मेरी रचनाएँ कहीं-न-कहीं अपनी आसपास की घटती घटनाओं के मन पर अंकित हस्ताक्षरों और कल्पना का समावेश है। अभी आई.आई.टी.(बी.एच.यू.) में रासायनिक अभियांत्रिकी की पढाई कर रहा हूँ। लिखने का यह सिलसिला अब तक जारी है और ताज़िंदगी रहेगा, ऐसा मेरा प्लेटिनिक-विश्वास कहता है।

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