गोविंदा और मैं

गाँवों में, कस्बों में कुछ ऐसी गलियाँ होती हैं, जहाँ हमने अपना समूचा बचपन बिताया होता है। आज भी उदास पलों में धीरे-धीरे वहाँ गुज़रे हुए सारे पल सरसराती महकती हवा की तरह गुज़रते हैं और मन अचानक खुश हो जाता है। लेकिन वक्त की सुईयाँ पंख लगाये उड़ती हैं। हमारे पैरों के नीचे वाले…

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उन कदमों की आहट

मेरे सामने हज़ारों-हज़ार की भीड़ सभागार में खचाखच भरी हुई है। गूँजते शोरों और पसरे हुए अँधेरों से अलग मैं मंच पर आज गायकी का एक सितारा बन गया हूँ। मेरे सारे ख़्वाब कामिल हो गए हैं। मैं धीरे से आँखें बंद करता हूँ, और मुझे वो ख़ास दिन याद आ जाता है जब इस…

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रंजिश-ए-ख़ामोशी

शांत था मैं उस दिन। इस वाक्य को दोहराते हुए अब मुझे एक महीना होने को था। कारण? किसी अपने की कमी थी। शायद मेरा नाम लेने वाला कोई अपना अब नहीं रहा था। शायद किसी मधुर आवाज़ की खोज थी। कोई ऐसा जो नाम भले ही दिन में एक बार ले, पर जिस दिन…

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बड़का अफसर

हर रोज़ की तरह आज फिर कृषि बीज भंडार में बाबा पंडित अपने कुर्सी पर विराजमान थे। वह जात से तो ब्राह्मण थे, मगर उनके पिताश्री की देन थी कि वह आज इस दुकान पर बैठे हैं। आज ग्राहकों के आकर्षण का केंद्र सिर्फ़ उनके दुकान के अव्वल बीज और खाद ही नहीं, बल्कि उनके…

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भीड़तंत्र

केश-गुच्छों को पकड़ कर नग्न-तन को खींचता द्रौपदी को ऐसे दुःशासन घसीटे जा रहा, रक्त आते हैं निकलकर वक्ष जिनमें दुग्ध है देख कर सारा तमाशा भीड़ हँसते जा रहा। उस सभा के सब सुधीजन बन गए धृतराष्ट्र हैं कर्णभेदी याचना है पर वधिर सब बन गए, है महज अपराध उसका वो कोई निर्दोष है…

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वेश्यावृत्ति के लिए लड़कियों की तस्करी

पिता का बस वो हाथ बँटाने छोड़ पिता का हाथ चली, पंद्रह सोलह साल की लड़की, एक अजनबी के साथ चली। उस दिनकर में मायूसी है औ’ है शर्म सितारों मे, देखो आज धरा पर लक्ष्मी बिक गयी चंद हज़ारो में। पहुँच गयी उन गलियों में वह, कुछ सहमी कुछ डरी हुई ला पटक दिया…

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प्यार की खोज

पूरा बचपन प्यार-मोहब्बत की पिक्चर देखने में निकल गया। जब बड़े होकर अपने दोस्तों को प्यार के समंदर में गोते लगाते देखा, तो दिल ने दिमाग़ को इश्क़ के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। एक दिन जब उस तिलिस्मी इश्क़ को जानने को मन बेसब्र हो गया, तो निकल पड़ी मैं प्यार की…

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क्या सोचा था औ’ क्या पाया

क्या सोचा था औ’ क्या पाया

गंगा की धूमिल धारा में, तपते से मरू सहारा में, जेठों में पड़ी दरारों में, बेमौसम के सैलाबों में, तुमको घुटते देख रहा हूँ, मैं भारत हूँ खेद रहा हूँ। ना राम मिले ना मिली ही माया, क्या सोचा था औ क्या पाया। मुन्ना के पंजर दिखते हैं, अम्मा के नैना रिसते हैं, जीवन सर्वत्र…

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इश्क़ तुम्हारा

इश्क़ तुम्हारा

इश्क़ तुम्हाराग़ज़ल रुबाई,मधुर कहानी,मंद गीत है,लोरी भी है। इश्क़ तुम्हाराचहल-पहल है,कोयल-कलरव,हवा वसंती,बारिश भी है। इश्क़ तुम्हारादर्शन भी है,डगमग नैया,एक खेवैया,धारा भी है। इश्क़ तुम्हाराराधा भी है,शब्द मौन है,रात अकेली,सिसकी भी है।

कविता (मानव छंद)

कविता (मानव छंद)

कविता समाज का दर्पण अंतर्मन का अर्पण है, साहित्य के अंशुमाली का यह आत्म समर्पण है। अलंकार रस छंद सभी निज भावों की भाषा है, गति-यति-लय मिलन बिंदु पर सुख-दुख की परिभाषा है। व्यथित हृदय प्यासे को ज्यों दरिया देत दिलासा है, लश्तम-पश्तम में हिय निज भरती यह जिज्ञासा है। मदमस्ती मदहोशी है बेहोशी खामोशी…

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